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कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि किसान धान के साथ-साथ सोयाबीन की खेती कर कम लागत में बेहतर मुनाफा कमा सकते हैं. सोयाबीन की उन्नत किस्में करीब 100 दिनों में तैयार हो जाती हैं. वैज्ञानिक तरीके से खेती करने पर 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन दे सकती हैं.
देवघर: मानसून की बारिश शुरू होते ही गांव-देहात के खेतों में रौनक बढ़ जाती है. किसान धान की नर्सरी तैयार करने में जुट जाते हैं और खरीफ सीजन की खेती की शुरुआत हो जाती है. झारखंड समेत पूरे पूर्वी भारत में धान किसानों की पहली पसंद मानी जाती है. वहीं, अब कृषि वैज्ञानिक किसानों को एक ऐसी फसल की खेती करने की सलाह दे रहे हैं. ये कम लागत में धान की तुलना में बेहतर मुनाफा दे सकती है. यह फसल है सोयाबीन, जिसकी मांग देशभर के बाजारों में लगातार बढ़ रही है. यही कारण है कि अब कई किसान धान के साथ-साथ सोयाबीन की खेती की ओर भी रुख कर रहे हैं.
क्या कहते हैं कृषि वैज्ञानिक
देवघर कृषि विज्ञान केंद्र के कृषि वैज्ञानिक डॉ. विवेक कश्यप ने लोकल 18 से बातचीत में बताया कि जून और जुलाई का महीना खरीफ फसलों की बुवाई के लिए सबसे महत्वपूर्ण समय होता है. इस दौरान किसान यदि सही फसल का चयन करें तो कम समय में अच्छी आमदनी प्राप्त कर सकते हैं. उन्होंने बताया कि सोयाबीन ऐसी फसल है, जो कम लागत में अच्छी पैदावार देती है. बाजार में इसकी कीमत भी किसानों को अच्छी मिल जाती है. यही वजह है कि पिछले कुछ सालों में सोयाबीन की खेती का चलन लगातार बढ़ रहा है.
इन किस्मों के बीज हैं बेहतर
डॉ. कश्यप के अनुसार, झारखंड के किसानों के लिए बिरसा सोयाबीन-01, बिरसा सफेद सोयाबीन-02 और आरटीएस-18 जैसी उन्नत किस्में काफी बेहतर हैं. ये किस्में यहां की जलवायु और मिट्टी के अनुसार विकसित की गई हैं. इनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इन पर कीटों और कई सामान्य बीमारियों का प्रभाव अपेक्षाकृत कम पड़ता है. इससे किसानों को बार-बार कीटनाशकों का छिड़काव नहीं करना पड़ता. खेती की लागत भी कम हो जाती है. कम खर्च और बेहतर उत्पादन का यही संतुलन किसानों के लिए फायदे का सौदा साबित होता है.
100 दिनों में तैयार हो जाती है फसल
डॉ. कश्यप ने बताया कि सोयाबीन की खेती केवल झारखंड तक सीमित नहीं है. इसकी खेती पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, असम और उत्तर-पूर्व के कई राज्यों में भी बड़े पैमाने पर की जाती है. इस फसल को बहुत अधिक देखभाल की आवश्यकता नहीं होती. सामान्य कृषि प्रबंधन के साथ भी अच्छा उत्पादन मिल जाता है. बुवाई के लगभग 40 से 45 दिनों बाद पौधों में फूल आने लगते हैं, जिससे किसानों को फसल की स्थिति का अंदाजा हो जाता है. वहीं करीब 100 दिनों में फसल पूरी तरह पककर कटाई के लिए तैयार हो जाती है.
15 जून के बाद शुरू कर सकते हैं बुवाई
कृषि वैज्ञानिक का कहना है कि सोयाबीन की बुवाई जून के दूसरे सप्ताह से लेकर जुलाई के पहले सप्ताह तक कर लेनी चाहिए. यह समय सबसे उपयुक्त माना जाता है. मानसून की शुरुआती बारिश के कारण खेतों में पर्याप्त नमी बनी रहती है. बीजों का अंकुरण बेहतर होता है. हालांकि किसानों को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि खेत में पानी जमा न हो, क्योंकि अत्यधिक जलभराव फसल को नुकसान पहुंचा सकता है. अच्छी जल निकासी वाली भूमि में सोयाबीन का उत्पादन बेहतर होता है.
20 से 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज
उत्पादन की बात करें तो उन्नत किस्मों और वैज्ञानिक तरीके से खेती करने पर किसान 20 से 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उपज प्राप्त कर सकते हैं. बाजार में सोयाबीन का उपयोग तेल, पशु आहार और कई खाद्य उत्पादों के निर्माण में किया जाता है, इसलिए इसकी मांग पूरे वर्ष बनी रहती है. मांग अधिक होने के कारण किसानों को अपनी उपज बेचने में भी ज्यादा परेशानी नहीं होती. यही वजह है कि सोयाबीन को कम लागत में अधिक मुनाफा देने वाली फसलों में गिना जाता है.
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न्यूज़18इंडिया में कार्यरत हैं. आजतक से रिपोर्टर के तौर पर करियर की शुरुआत फिर सहारा समय, ज़ी मीडिया, न्यूज नेशन और टाइम्स इंटरनेट होते हुए नेटवर्क 18 से जुड़ी. टीवी और डिजिटल न्यूज़ दोनों विधाओं में काम करने क…और पढ़ें