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Kathputli Kala Rajasthan: राजस्थान की प्रसिद्ध कठपुतली कला सदियों से राज्य की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है. कई परिवारों ने पीढ़ी दर पीढ़ी इस लोककला को जीवित रखा और देश-विदेश के मंचों पर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया. ऐसे ही एक परिवार की सात पीढ़ियां कठपुतली कला से जुड़ी रही हैं. इन कलाकारों ने भारत ही नहीं बल्कि विदेशों में भी राजस्थान की लोक संस्कृति का गौरव बढ़ाया है. हालांकि बदलते समय, आधुनिक मनोरंजन के साधनों और घटते अवसरों के कारण आज इन कलाकारों की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर हो गई है. कभी हजारों दर्शकों को आकर्षित करने वाली यह कला अब अस्तित्व के संकट से जूझ रही है. पर्याप्त मंच और सरकारी सहयोग नहीं मिलने से कलाकारों के लिए परिवार का भरण-पोषण करना भी कठिन हो गया है.
जयपुर: जयपुर कला संस्कृति और विरासत की परम्पराओं से जुड़ा शहर हैं जहां भिन्न-भिन्न प्रकार की कलाओं को लोगों ने पीढीयों से बरकरार रखा हैं. ऐसे ही राजस्थान की प्रसिद्ध कठपुतली कला जो प्राचीन समय से ही लोककथाओं और मनोरंजन के रूप में सबसे प्रसिद्ध कला हैं. जिसकी वर्षों पुरानी विरासत आज भी जयपुर के कठपुतली कारीगरों ने संभाल कर रखी हैं. जयपुर में स्थित कठपुतली कॉलोनी जहां आज भी सैकड़ों परिवार कठपुतलियां बनाने से लेकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी कला बिखेरते हैं.
लोकल-18 ने जयपुर के कठपुतली नगर में पहुंच कर यहां पीढ़ियों से कठपुतली कला की विरासत को संभालें हुए कलाकार नोटरिया भाट बताते हैं कि 7 पीढ़ियों से उनके पूर्वज इस कला से जुड़े हुए हैं. उन्हें उनके पिता सुल्तान भाट से सिखी, ऐसे ही कठपुतली कॉलोनी में ऐसे कई लोग हैं, जो इस कला से जुड़े हुए हैं लेकिन लगातार अब यह कला मोबाइल और इंटरनेट की वज़ह से लुप्त होने की कगार पर हैं. सिर्फ किले महलों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों ही लोगों को कठपुतली नृत्य देखने को मिलता हैं.
अंतरराष्ट्रीय मंचों तक बिखेरी कठपुतली कला की चमक
लोकल-18 से बात करते हुए कलाकार नोटरिया भाट बताते हैं कि उन्होंने गांव-गांव से लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों तक कठपुतली की कला को पहुंचाया, पूरा जीवन कठपुतली बनाने और शो करने में बिताया, लेकिन अब लगातार बढ़ती मंहगाई और लुप्त होती कला के चलते उनका जीवन गुजारना भी मुश्किल हो गया हैं. भाट बताते हैं पहले वह सिर्फ पपेट् शो किया करते थे लेकिन बाद में लगातार लुप्त होती इस कला के चलते उन्होंने पपेट बनाने का काम शुरू किया लेकिन आज बाजारों में पपेट से भी उनका गुज़ारा नहीं होता क्योंकि कठपुतली बनाने में ही 100 से 150 रूपए का खर्च आता हैं और बाजारों में लोग खरीदते तक नहीं हैं. जिसके चलते अब यह कला बस एक विरासत की पहचान के रूप में बनकर रह गई हैं लगातार इस कला से जुड़े कलाकार इस कला को छोड़ रहे हैं और अपना जीवन यापन करने के लिए दूसरे रोजगार की तलाश में रहते हैं. जयपुर के इस कठपुतली कॉलोनी में सिर्फ कुछ एक परिवार बचे हैं, जो आज भी इस कला को जीवित रखने के लिए दिन-रात काम करते हैं.
राजा महाराजाओं के समय मिलता था ख़ूब ईनाम
लोकल-18 से बात करते हुए भाट बताते हैं कठपुतली नृत्य को लोकनाट्य की ही एक शैली के रूप में माना जाता है. कठपुतली कला प्राचीन समय से चली आ रहा लोककला है. जिससे अलग अलग किरदार की गुड़िया बनाकर उन्हें नचाया जाता हैं. कठपुतली कला का उल्लेख प्राचीन ग्रंथों में भी किया गया हैं. कठपुतली नृत्य में विशेष रूप से परिधान, काष्ठकला, वस्त्र-निर्माण कला, रूप-सज्जा, संगीत, नृत्य के माध्यम से लोगों का मनोरंजन किया जाता हैं. भाट बताते हैं कि एक जमाना था. जब राजा महाराजाओं और सेठ साहूकार के दरबार में कटपुतली कला दिखाई जाती थी और इस कला से ख़ूब ईनाम मिलती थी. लेकिन आज कठपुतली कला से जुड़े कलाकारों की हालत ऐसी हैं कि वह अपने परिवार को पालने में भी सक्षम नहीं हैं.
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