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कभी 400-500 हिरनों के झुंड से गुलजार थे पलामू के जंगल, कहलाता...


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Palamu Once Called Land Of Tigers: पलामू कभी बाघ देश और हिरणों के झुंडों के लिए मशहूर हुआ करता था. दरअसल 1972 से पहले शिकार खुला था और कोई रोक नहीं थी. कानून आने के बाद सख्त रोक लगी लेकिन तब तक वन्य जीवों की संख्या काफी कम हो चुकी थी. अब वापस वही जैव विविधता पाना चुनौती से कम नहीं है.

पलामू. आज के समय में पलामू अपनी प्राकृतिक संपदा, घने जंगलों और वन्यजीव संरक्षण के लिए जाना जाता है, लेकिन कभी एक दौर ऐसा भी था, जब यहां के जंगलों में वन्यजीवों की संख्या आज की तुलना में कई गुना अधिक थी. पलामू जिले को किसी जमाने में ‘बाघ देश’ के नाम से भी पहचान मिलती थी. यहां के जंगलों में हिरणों के बड़े-बड़े झुंड आम बात थे, लेकिन शिकार पर किसी तरह की सख्ती नहीं होने के कारण बड़ी संख्या में वन्यजीवों का शिकार किया जाता था. नतीजतन, समय के साथ इनकी संख्या तेजी से घटती चली गई.

1970 के दशक तक हर ओर दिखते थे हिरणों के झुंड
पलामू के वरिष्ठ वन्यजीव विशेषज्ञ डॉ. डी.एस. श्रीवास्तव ने लोकल18 को बताया कि वर्ष 1970 के आसपास पलामू के जंगलों का दृश्य बिल्कुल अलग था. जंगलों में घूमते समय एक जगह 400 से 500 हिरणों का झुंड आसानी से दिखाई देता था. सांभर, चीतल और अन्य वन्यजीव भी बड़ी संख्या में मौजूद थे. उस समय जंगल जैव विविधता से भरपूर थे, लेकिन संरक्षण की व्यवस्था मजबूत नहीं होने के कारण इनका लगातार शिकार होता रहा.

हिरण के मांस और खाल की थी खुलेआम मांग
डॉ. श्रीवास्तव ने आगे बताया कि उस समय वन्यजीवों के शिकार को लेकर लोगों में कोई खास डर नहीं था. कई घरों में हिरण का मांस पकता था और उसकी खाल का इस्तेमाल जूते सहित अन्य चमड़े के सामान बनाने में किया जाता था. चैनपुर, शाहपुर और हवाई अड्डा क्षेत्र के आसपास हिरण की खाल से जूते तैयार किए जाते थे. उस दौर में विभिन्न वन्यजीवों की खाल स्थानीय स्तर पर आसानी से उपलब्ध हो जाती थी और लोग उसका खुलेआम इस्तेमाल करते थे.

1972 के बाद बदली तस्वीर, मिला वन्यजीवों को कानूनी संरक्षण
डॉ. श्रीवास्तव ने आगे कहा कि वर्ष 1972 से पहले वन्यजीवों के शिकार पर प्रभावी कानूनी रोक नहीं थी. इसी वजह से बाघ, हिरण और अन्य जंगली जानवरों का बड़े पैमाने पर शिकार होता था. उस समय हिरण की खाल कुछ ही रुपये में मिल जाती थी, जबकि बाघ की खाल भी बेहद कम कीमत पर बिकती थी.

हालांकि, वर्ष 1972 में कानून लागू होने के बाद शिकार पर सख्त पाबंदी लगी और वन्यजीवों को कानूनी सुरक्षा मिली. इसके बाद संरक्षण के प्रयास तेज हुए और जंगलों में वन्यजीवों को बचाने की दिशा में व्यापक अभियान शुरू किए गए. आज पलामू के जंगल फिर से वन्यजीव संरक्षण की नई पहचान बना रहे हैं, हालांकि पुराने दौर जैसी जैव विविधता वापस लाना अब भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है.

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Raina Shukla

बुंदेलखंड यूनिवर्सिटी से मास कम्यूनिकेशन एंड जर्नलिज़्म में मास्टर्स, गोल्ड मेडलिस्ट. पत्रकारिता का सफर दैनिक जागरण से शुरू हुआ, फिर प्रभात खबर और ABP न्यूज़ से होते हुए News18 Hindi तक पहुंचा. करियर और देश की …और पढ़ें



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