Shani Pradosh Vrat 2026: आज शनि प्रदोष तिथि का व्रत किया जा रहा है. हिंदू धर्म में प्रदोष व्रत भगवान शिव की आराधना के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है. जब प्रदोष व्रत शनिवार के दिन पड़ता है, तो उसे शनि प्रदोष व्रत कहा जाता है. इस बार शनि प्रदोष व्रत शुभ योग में मनाया जा रहा है, जिससे इसका धार्मिक महत्व और अधिक बढ़ गया है. मान्यता है कि इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की विधिपूर्वक पूजा करने से जीवन के कष्ट दूर होते हैं और शनिदेव की कृपा भी प्राप्त होती है. श्रद्धालु इस दिन व्रत रखकर प्रदोष काल में शिव पूजा करते हैं और सुख-समृद्धि की कामना करते हैं. इस बार शनि प्रदोष व्रत पर साध्य योग, शुभ योग और रवि नामक योग का शुभ संयोग बन रहा है, जिससे आज के दिन का महत्व और भी बढ़ गया है. आइए जानते हैं शनि प्रदोष व्रत पर शिव पूजन का महत्व, पूजा विधि, शुभ मुहूर्त, मंत्र और आरती…
शनि प्रदोष व्रत का महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, प्रदोष काल भगवान शिव का प्रिय समय माना जाता है. शनिवार को पड़ने वाला प्रदोष व्रत विशेष रूप से शनि ग्रह से जुड़े कष्टों को कम करने वाला माना जाता है. ऐसा विश्वास है कि इस दिन श्रद्धा और नियमपूर्वक भगवान शिव का अभिषेक, रुद्राभिषेक और मंत्र जाप करने से शनि दोष, साढ़ेसाती और ढैय्या के दौरान मानसिक बल प्राप्त होता है. साथ ही जीवन में आने वाली बाधाएं दूर होने, रोग-शोक से राहत मिलने और परिवार में सुख-शांति बनी रहने की कामना की जाती है. कहा जाता है कि भगवान शिव की कृपा से शनिदेव भी प्रसन्न होते हैं, क्योंकि शनि देव स्वयं भगवान शिव के परम भक्त माने जाते हैं. इसलिए इस दिन शिव पूजा के साथ शनिदेव की आराधना का भी विशेष महत्व बताया गया है.
शनि प्रदोष व्रत 2026 आज
त्रयोदशी तिथि का प्रारंभ – 27 जून, सुबह 10 बजकर 22 मिनट से
त्रयोदशी तिथि का समापन – 28 जून, रात 12 बजकर 43 मिनट तक
प्रदोष काल का ध्यान रखते हुए आज शनि प्रदोष व्रत किया जा रहा है.
पूजा का शुभ मुहूर्त 2026: शाम 7 बजकर 4 मिनट से लेकर रात 9 बजकर 6 मिनट तक
शनि प्रदोष व्रत पूजा विधि 2026
शनि प्रदोष व्रत के दिन प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और व्रत का संकल्प लें. दिनभर सात्विक आहार का पालन करें या अपनी श्रद्धा और क्षमता के अनुसार उपवास रखें. प्रदोष काल में भगवान शिव, माता पार्वती, भगवान गणेश और नंदी महाराज की पूजा करें. शिवलिंग का गंगाजल, दूध, दही, शहद, घी और शुद्ध जल से अभिषेक करें. इसके बाद बेलपत्र, धतूरा, आक के फूल, सफेद चंदन, भस्म और मौसमी फल अर्पित करें. पूजा के दौरान ॐ नमः शिवाय मंत्र का जाप करें और शिव चालीसा, रुद्राष्टकम या शिव तांडव स्तोत्र का पाठ करना भी शुभ माना जाता है. पूजा के अंत में घी का दीपक जलाकर भगवान शिव की आरती करें और परिवार की सुख-समृद्धि, उत्तम स्वास्थ्य तथा मनोकामना पूर्ति की प्रार्थना करें. शनिवार होने के कारण श्रद्धालु शनिदेव के समक्ष तिल के तेल का दीपक भी जला सकते हैं.
शिवजी के मंत्र:
ॐ नमः शिवाय
ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः सोमाय नमः
ऊँ ऐं ह्रीं शिव-गौरीमय-ह्रीं ऐं ऊँ
ऊँ नमो धनदाय स्वाहा
शिवजी रुद्र मंत्र:
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥
प्रदोष स्तुति:
शिवाय नमस्तुभ्यं प्रदोषं पूजितं मया। क्षमस्व अपराधं मे करुणासागर प्रभो॥
शिवजी की आरती
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।
ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
एकानन चतुरानन पञ्चानन राजे।
हंसासन गरूड़ासन वृषवाहन साजे॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
दो भुज चार चतुर्भुज दसभुज अति सोहे।
त्रिगुण रूप निरखत त्रिभुवन जन मोहे॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
अक्षमाला वनमाला मुण्डमालाधारी।
त्रिपुरारी कंसारी कर माला धारी॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
श्वेताम्बर पीताम्बर बाघंबर अंगे।
सनकादिक गरुड़ादिक भूतादिक संगे॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
कर के मध्य कमण्डल चक्र त्रिशूलधारी।
जगकर्ता जगभर्ता जगसंहारकर्ता॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।
प्रणवाक्षर के मध्ये ये तीनों एका॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
पर्वत सोहैं पार्वती, शंकर कैलासा।
भांग धतूरे का भोजन, भस्मी में वासा॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
जटा में गंग बहत है, गल मुण्डन माला।
शेष नाग लिपटावत, ओढ़त मृगछाला॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
काशी में विराजे विश्वनाथ, नन्दी ब्रह्मचारी।
नित उठ दर्शन पावत, महिमा अति भारी॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
त्रिगुणस्वामी जी की आरति जो कोइ नर गावे।
कहत शिवानन्द स्वामी, मनवान्छित फल पावे॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥ स्वामी ॐ जय शिव ओंकारा॥