गाजीपुर: आम, आंवला और बेल का मुरब्बा तो आपने कई बार खाया होगा, लेकिन क्या कभी बाँस का मुरब्बा चखा है? गाजीपुर मेले में असम से आए विक्रेता संतोष कुमार गुप्ता लोगों को बाँस की कोमल कोंपलों से तैयार होने वाला अनोखा मुरब्बा दिखा रहे हैं, जिसकी खास बात यह है कि इसे चीनी के बजाय शहद से तैयार किया जाता है.
संतोष कुमार गुप्ता बताते हैं कि इस मुरब्बे के लिए सामान्य स्थानीय बाँस का उपयोग नहीं किया जाता. इसके लिए असम और नागालैंड के आसपास मिलने वाली विशेष प्रजाति के बाँस (Bamboo) की कोमल कोंपलें इस्तेमाल की जाती हैं। जब बाँस लगभग 8 से 10 फीट तक बढ़ जाता है, तब उसकी उपयुक्त कोंपलों का चयन किया जाता है.
बनाने की विधि
बाँस की नई और कोमल कोंपलों को छीलकर छोटे टुकड़ों में काटा जाता है. इन्हें कई बार पानी से धोया जाता है ताकि प्राकृतिक कड़वाहट कम हो जाए. फिर 20–30 मिनट तक उबाला जाता है कई पारंपरिक विधियों में यह प्रक्रिया 2–3 बार दोहराई जाती है.
अलग से शहद और पानी की चाशनी तैयार की जाती है. उबली हुई बाँस की कोंपलों को चाशनी में डालकर धीमी आंच पर पकाया जाता है, ताकि चाशनी अंदर तक समा जाए.
विक्रेता के अनुसार, कोंपलों को पहले साफ किया जाता है और प्रोसेसिंग के दौरान उनका रेशा अलग करने की प्रक्रिया अपनाई जाती है। इसके बाद उन्हें उबालकर आगे की तैयारी की जाती है.
शहद से होता है तैयार
अंत में चीनी की जगह शहद मिलाया जाता है. उनका कहना है कि शहद मुरब्बे का स्वाद बढ़ाने के साथ-साथ उसकी शेल्फ लाइफ (सुरक्षित रखने की अवधि) भी बढ़ाने में मदद करता है.
नियमित सेवन से शरीर को लाभ
संतोष कुमार गुप्ता का दावा है कि असम में यह मुरब्बा लंबे समय से खाया जाता है और लोग इसे अपने पारंपरिक खान-पान का हिस्सा मानते हैं. उनका यह भी दावा है कि नियमित सेवन से शरीर को लाभ मिलता है और लंबे समय बाद कद (हाइट) में भी फर्क महसूस हो सकता है. हालांकि, इस दावे की वैज्ञानिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है और इसे विक्रेता का व्यक्तिगत दावा माना जाना चाहिए.
गाजीपुर मेले में यह अनोखा मुरब्बा लोगों के बीच जिज्ञासा का विषय बना हुआ है. कई लोग इसे पहली बार देखकर इसकी रेसिपी और स्वाद के बारे में जानकारी ले रहे हैं, जबकि कुछ इसे खरीदकर चखने में भी रुचि दिखा रहे हैं.