क्या किसी को मां की गाली देना अपने आप में अपराध माना जा सकता है और उसके खिलाफ केस चलाया जा सकता है? सुप्रीम कोर्ट ने इस सवाल पर अहम फैसला सुनाया है. कोर्ट ने अभद्र भाषा और अश्लीलता को लेकर साफ किया कि हर गाली या अपमानजनक शब्द अपने आप में अश्लील अपराध की श्रेणी में नहीं आता. अदालत ने कहा कि किसी शब्द का आपत्तिजनक, अशिष्ट या असभ्य होना और कानूनी रूप से अश्लील होना, दोनों अलग-अलग बातें हैं.
कानूनी मामलों की रिपोर्टिंग करने वाली वेबसाइट बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने कहा कि केवल गाली-गलौज या अपशब्दों के इस्तेमाल से भारतीय कानून के तहत अश्लीलता का अपराध साबित नहीं हो जाता. इसके लिए कानून में तय मानकों को पूरा करना जरूरी है.
सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी तमिलनाडु के एक व्यक्ति की याचिका पर सुनवाई करते हुए की, जिसे आईपीसी की धारा 294(b) के तहत दोषी ठहराया गया था.
‘अभद्रता और अश्लीलता में फर्क’
अदालत ने कहा कि अश्लीलता केवल अभद्र भाषा का दूसरा नाम नहीं है. कोर्ट ने साफ किया कि गाली, अपशब्द या असभ्य शब्द भले ही किसी को खराब लग सकते हैं, लेकिन हर ऐसा शब्द कानूनी तौर पर अश्लील नहीं माना जा सकता.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कोई शब्द तभी अश्लीलता के दायरे में आएगा जब वह कामुक रुचि को बढ़ावा देता हो, लोगों की नैतिकता को प्रभावित करने की प्रवृत्ति रखता हो और कानून में निर्धारित अन्य शर्तों को पूरा करता हो.
अदालत ने कहा कि केवल किसी शब्द से घृणा, नाराजगी या असहजता पैदा होना उसे अश्लील अपराध नहीं बना देता.
जमीन विवाद से जुड़ा था मामला
यह मामला तमिलनाडु के एक कृषि भूमि विवाद से जुड़ा था. अगस्त 2017 में हुए विवाद के दौरान आरोपी मणि पर आरोप था कि उसने शिकायतकर्ता के साथ मारपीट की और गाली-गलौज की.
अभियोजन पक्ष के मुताबिक, आरोपी ने शिकायतकर्ता को मां की गाली दी और बाद में घर से धारदार हथियार लाकर हमला कर दिया. हमले में शिकायतकर्ता के माथे, नाक और अंगूठे पर चोटें आई थीं. मेडिकल जांच में उसकी नाक की हड्डी टूटने की पुष्टि हुई थी.
कोर्ट ने आरोपी को दी राहत
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि कथित अपशब्द भले ही आपत्तिजनक और असभ्य हों, लेकिन वे आईपीसी की धारा 294(b) के तहत अश्लीलता के अपराध की आवश्यक शर्तों को पूरा नहीं करते.
अदालत ने कहा कि इस धारा के तहत यह साबित होना जरूरी है कि सार्वजनिक स्थान पर इस्तेमाल किए गए शब्दों से दूसरों को परेशानी या झुंझलाहट हुई हो. इस मामले में ऐसा कोई ठोस सबूत पेश नहीं किया गया. इसके आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी की धारा 294(b) और धारा 506(ii) के तहत दोषसिद्धि को रद्द कर दिया.
मारपीट के मामले में सजा बरकरार
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी को मारपीट के मामले में दोषी माना. अदालत ने कहा कि मेडिकल रिपोर्ट और अन्य सबूत हमले की पुष्टि करते हैं. मणि को आईपीसी की धारा 326 के तहत दोषी ठहराया गया. हालांकि, घटना के समय को देखते हुए और आरोपी की उम्र करीब 70 वर्ष होने और स्वास्थ्य स्थिति को ध्यान में रखते हुए अदालत ने सजा कम कर दी.
कोर्ट ने उसे अदालत उठने तक की सजा सुनाई और 50 हजार रुपये का जुर्माना जमा करने का निर्देश दिया. जुर्माना दो महीने के भीतर जमा करना होगा.
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला अभिव्यक्ति, भाषा और आपराधिक कानून के बीच अंतर को स्पष्ट करता है. अदालत ने दोहराया कि कानून में अपराध तय करने के लिए केवल शब्दों की कठोरता नहीं, बल्कि उनका संदर्भ, उद्देश्य और प्रभाव भी महत्वपूर्ण होता है.