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Uddhav Thackeray Masterplan: शिवसेना (यूबीटी) के चीफ उद्धव ठाकरे अपनी पार्टी को बचाने के लिए आर-पार के मूड में आ गए हैं. एकनाथ शिंदे गुट में छह लोकसभा सांसदों के जाने के बाद पार्टी बड़े संकट में है. इस डैमेज को कंट्रोल करने के लिए उद्धव ठाकरे ने एक शानदार स्ट्रैटेजी बनाई है. यह मास्टरप्लान तीन अहम पिलर्स पर टिका हुआ है. इसमें पार्टी की पुरानी विचारधारा को मजबूत करना शामिल है. इसके साथ ही युवाओं को उनके मुद्दों के जरिए पार्टी से जोड़ना एक बड़ा कदम है. वहीं सुप्रीम कोर्ट में बागियों के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ना भी इस प्लान का हिस्सा है. पार्टी के कई बड़े नेताओं के साथ छोड़ने के बाद अब उद्धव ठाकरे ने आक्रामक रुख अपना लिया है. वह महाराष्ट्र का सियासी माहौल एनडीए गठबंधन के खिलाफ मोड़ने में जुट गए हैं. (Photos : PTI)
उद्धव ठाकरे ने महाराष्ट्र में ‘राम रक्षा’ अभियान शुरू किया है. उन्होंने बीजेपी मुक्त राम आंदोलन के जरिए बड़ा दांव चला है. श्री राम मंदिर के चंदे में वित्तीय गड़बड़ी का मुद्दा उठाकर उन्होंने सबको चौंका दिया है. यह मुद्दा पॉलिटिक्स के लिहाज से बहुत अहम माना जा रहा है. ऐसा इसलिए है क्योंकि हिंदुत्व हमेशा से बीजेपी का सबसे बड़ा आधार रहा है.
राम मंदिर आंदोलन के वित्तीय मामलों पर सवाल उठाकर ठाकरे ने सीधी चुनौती दी है. उन्होंने चांदी की ईंटों और चंदे का हिसाब मांगकर बीजेपी के कोर वोट बैंक को टारगेट किया है. इस दांव से बीजेपी अपने ही गढ़ में डिफेंसिव मोड में आ गई है. नागपुर में बीजेपी को चुनौती देकर शिवसेना (यूबीटी) ने बड़ा मैसेज दिया है. वह अपने पारंपरिक वोटर्स को बताना चाहती है कि उन्होंने अपना मूल एजेंडा नहीं छोड़ा है.
सिर्फ हिंदुत्व ही नहीं बल्कि उद्धव ठाकरे युवाओं के मुद्दों पर भी फोकस कर रहे हैं. जंतर-मंतर जाना और नीट पेपर लीक के खिलाफ आवाज उठाना इसका बड़ा उदाहरण है. उन्होंने प्रदर्शनकारी छात्रों पर हुए पुलिस एक्शन की कड़ी निंदा की है. ठाकरे ने मौजूदा सरकार की तुलना पुराने अंग्रेजी शासन से कर दी है. इसके अलावा उन्होंने मुफ्त लीगल हेल्प सेंटर भी शुरू किए हैं. इन कदमों के जरिए उन्होंने अपनी स्ट्रैटेजी में बड़ा बदलाव किया है.
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ठाकरे अर्बन और मिडिल क्लास वोटर्स के बीच अपनी पैठ मजबूत करना चाहते हैं. इसलिए वह पारंपरिक पॉलिटिक्स से थोड़ा अलग रास्ता भी अपना रहे हैं. छात्रों के प्रोटेस्ट में शामिल होकर उन्होंने एजुकेशन सिस्टम पर सवाल खड़े किए. उन्होंने एग्जाम्स की ट्रांसपेरेंसी को लेकर राज्य सरकार को भी घेरा. तटस्थ और युवा वोटर्स को अपने पाले में लाने के लिए यह एक स्मार्ट मूव है.
राजनीतिक लड़ाई के साथ-साथ कानूनी मोर्चे पर भी जंग जारी है. सुप्रीम कोर्ट ने 22 जुलाई को अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया था. इसके बावजूद शिंदे गुट के बागी सांसदों पर कानूनी तलवार लटकी हुई है. स्पीकर और सचिवालय से मिले नोटिस ने उनकी टेंशन बढ़ा दी है. यह पूरा मामला दल-बदल विरोधी कानून के तहत चल रहा है. इसमें ‘विभाजन’ और ‘विलय’ के नियमों की कड़ी परीक्षा हो रही है. यह तब और अहम हो जाता है जब मूल पार्टी अपना वजूद बनाए रखती है. पॉलिटिक्स के नजरिए से उद्धव ने बागियों को अवसरवादी नेता साबित कर दिया है. उन्होंने जनता को मैसेज दिया है कि इन नेताओं ने उनके वोट का धोखा दिया है. इस कानूनी लड़ाई से जनता की सिम्पथी शिवसेना (यूबीटी) की तरफ शिफ्ट हो रही है.
महाराष्ट्र के सियासी इतिहास में ठाकरे परिवार का अलग रुतबा है. पहले उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे के अलग होने से बड़ा नुकसान हुआ था. इससे मुंबई, ठाणे और कोंकण बेल्ट में शिवसेना का फिक्स वोट बैंक बंट गया था. अब राज ठाकरे के साथ दोबारा जुड़ने की सुगबुगाहट तेज हो गई है. अगर ऐसा होता है तो यह एक बेहद मजबूत गठबंधन साबित होगा. आने वाले बीएमसी और विधानसभा चुनावों में इससे मराठी वोटर्स एकजुट हो सकते हैं. यह एक ऐसा फ्रंट बनेगा जिसे तोड़ना राष्ट्रीय पार्टियों के लिए आसान नहीं होगा. हालांकि अभी भी उद्धव ठाकरे के सामने कई बड़े चैलेंज मौजूद हैं. सांसदों और विधायकों के लगातार पार्टी छोड़ने से ग्राउंड लेवल पर वर्कर कन्फ्यूज हैं. भले ही जनता का सपोर्ट उद्धव के साथ हो लेकिन संगठन कमजोर हुआ है.
पॉलिटिकल एक्सपर्ट्स के मुताबिक उद्धव ठाकरे एक मुश्किल रास्ते पर चल रहे हैं. राम मंदिर के जरिए कट्टर हिंदुत्व का मैसेज देना जरूरी है. लेकिन इसके साथ ही सामाजिक और युवा मुद्दों पर भी पकड़ बनाए रखनी होगी. सबसे बड़ा चैलेंज गठबंधन की पॉलिटिक्स में सही बैलेंस मेंटेन करना है. उन्हें ध्यान रखना होगा कि उनके सेक्युलर और राष्ट्रवादी सहयोगी इस हिंदुत्व वाले रुख से नाराज न हों. सुप्रीम कोर्ट में भी कानूनी मामलों की सुनवाई बहुत लंबी चलती है. अगर सही समय पर कोर्ट का फैसला नहीं आता है तो दिक्कतें बढ़ सकती हैं. चुनाव से पहले ग्राउंड लेवल पर जो माहौल बन चुका है उसे बदलना आसान नहीं होगा. फिर भी उद्धव ठाकरे के हालिया एक्शन बताते हैं कि वह हार मानने वाले नहीं हैं. वह अपनी पार्टी को दोबारा खड़ा करने के लिए हर मुमकिन कोशिश कर रहे हैं.