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महुआ के बीज से बनता है ये देसी तेल, सिर्फ तीन महीने...


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Mahua Seed Oil: झारखंड अपनी खनिज संपदा, घने जंगल और प्राकृतिक संसाधनों के लिए पूरे देश में अलग पहचान रखता है. यहां जंगलों में मिलने वाले कई पेड़-पौधे आज भी लोगों की जिंदगी का अहम हिस्सा हैं.इन्हीं में से एक है महुआ का पेड़, जिसे ग्रामीण इलाके के लोग किसी धरोहर से कम नहीं मानते. देवघर, दुमका, जामताड़ा, गोड्डा, साहिबगंज समेत झारखंड के कई जिलों के गांवों में महुआ के पेड़ बड़ी संख्या में देखने को मिल जाते हैं. महुआ का फूल, फल और बीज तीनों ही किसी न किसी रूप में लोगों के काम आते हैं.खासकर महुआ के बीज से निकाला जाने वाला तेल, जिसे देवघर और आसपास के गांवों की बोलचाल की भाषा में “कोड़ी का तेल” कहा जाता है, आज भी लोगों की पहली पसंद बना हुआ है.

गाँव की गृहणी रुद्रानी देवी ने लोकल 18 के संवाददाता से बातचित करते हुए कहाँ कि कोड़ी का तेल सालभर नहीं मिलता. यह केवल करीब तीन महीने के लिए ही उपलब्ध होता है.महुआ के फल पकने के बाद उसके बीज को सुखाया जाता है, फिर पारंपरिक तरीके से कोल्हू या मशीन में पेरकर तेल निकाला जाता है. यही वजह है कि इस तेल की कीमत सिर्फ पैसे से नहीं, बल्कि इसकी शुद्धता और प्राकृतिक गुणों से भी आंकी जाती है.

गांव के लोग इसे बाजार में मिलने वाले रिफाइंड या मिलावटी तेल से कहीं ज्यादा बेहतर मानते हैं. उनके अनुसार यह पूरी तरह प्राकृतिक होता है और इसमें किसी तरह की मिलावट नहीं रहती. बरसात का मौसम शुरू होते ही गांवों में पकौड़े, पूरी, पुआ और दूसरी कई पारंपरिक चीजें बनाने का दौर शुरू हो जाता है. ऐसे समय में अधिकांश ग्रामीण परिवार कोड़ी के तेल का ही इस्तेमाल करते हैं.

गांव की महिलाएं हंसते हुए कहती हैं कि, “खाए में थोड़ा कड़वा जरूर लगत है, लेकिन देह खातिर ई तेल बड़ा फायदेमंद होय छै” उनका कहना है कि इस तेल में बने पकौड़े खाने से पेट भारी नहीं होता और गैस या अपच जैसी दिक्कत भी कम होती है.यही वजह है कि आज भी गांवों में बरसात का स्वाद महुआ के तेल के बिना अधूरा माना जाता है.

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गृहणियों का कहना है कि आजकल बाजार में मिलने वाले कई तरह के तेलों में मिलावट की शिकायतें सामने आती रहती हैं. ऐसे तेल में तली हुई चीजें खाने से कई लोगों को पेट दर्द, एसिडिटी, गैस और दूसरी परेशानियां होने लगती हैं. लेकिन गांव के लोग पीढ़ियों से महुआ के तेल का इस्तेमाल करते आ रहे हैं.

उनका मानना है कि प्राकृतिक तरीके से तैयार होने के कारण यह तेल शरीर को नुकसान नहीं पहुंचाता.हालांकि इसका स्वाद दूसरे तेलों से थोड़ा अलग और हल्का कड़वा जरूर होता है, लेकिन गांव के लोग इसी स्वाद के आदी हैं और इसे ही असली स्वाद मानते हैं. ग्रामीणों का मानना है कि बदलते समय में भले ही बाजार में नए-नए ब्रांड के तेल आ गए हों, लेकिन महुआ के तेल की अपनी अलग पहचान आज भी कायम है.

बस तीन महिने ही पायी जाती है यह तेल.बरसात के मौसम में गांव की रसोई से उठती महुआ के तेल में तले पकौड़ों की खुशबू लोगों को बचपन की याद दिला देती है. यही कारण है कि देवघर और आसपास के ग्रामीण इलाकों में कोड़ी का तेल केवल एक खाद्य तेल नहीं, बल्कि परंपरा, स्वाद और प्राकृतिक जीवनशैली का हिस्सा माना जाता है. गांव के लोग आज भी पूरे विश्वास के साथ कहते हैं कि “थोड़ा कड़वा सही, लेकिन सेहत के लिए बढ़िया यही देसी कोड़ी का तेल है.



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