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Koderma Nandudih Mahal: झारखंड में कोडरमा जिले के सतगांवा प्रखंड स्थित नंदूडीह गांव में मौजूद राजा महावीर नारायण देव का ऐतिहासिक महल आज भी इस क्षेत्र के गौरवशाली अतीत का जीवंत प्रमाण बना हुआ है. समय के साथ महल का कुछ हिस्सा जर्जर जरूर हो गया है, लेकिन इसकी विशाल संरचना, मजबूत दीवारें और अनोखी वास्तुकला आज भी लोगों को उस दौर की समृद्ध संस्कृति और राजसी वैभव की याद दिलाती हैं.
इस प्रखंड के रहने वाली शंकर देव प्रजापति ने लोकल 18 से बताया कि उनके पूर्वजों से मिली जानकारी के अनुसार राजा परिवार मूल रूप से किसी अन्य क्षेत्र से यहां आकर बसे हुए थे. सबसे पहले उनका किला महावर पहाड़ की ऊंचाई पर स्थित था. बाद में राजा के दूसरे वंशजों ने नंदूडीह में एक नया और भव्य महल बनवाया.
वर्तमान में यही महल राजघराने की विरासत के रूप में शेष बचा है और स्थानीय लोगों के लिए इतिहास की अमूल्य धरोहर बना हुआ है. उन्होंने बताया कि इस महल की सबसे बड़ी खासियत इसकी अनोखी बनावट है. महल में 52 कोठरियां और 53 दरवाजे बनाए गए हैं.
इसकी संरचना इतनी जटिल थी कि यदि कोई अनजान व्यक्ति गलती से महल के भीतर प्रवेश कर जाता, तो वह भूलभुलैया जैसी बनावट में उलझ जाता और बाहर निकलने का रास्ता आसानी से नहीं खोज पाता. उस समय सुरक्षा के लिहाज से इस तरह की वास्तुकला बेहद प्रभावी मानी जाती थी.
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इसके अलावा महल की मजबूती भी लोगों को हैरान कर देती है. इसकी अधिकांश दीवारें 25 से 30 इंच मोटी हैं और पूरे महल का निर्माण चूना पत्थर से किया गया था. महल के दूसरे तल को सागवान की लकड़ियों से तैयार किया गया है. लगभग एक सदी बीत जाने के बाद भी कई हिस्सों में यही सागवान की लकड़ियां दूसरे तल को मजबूती से थामे हुए हैं.
हालांकि समय और मौसम की मार के कारण महल के कुछ हिस्से क्षतिग्रस्त होकर ढह चुके हैं. इस महल का निर्माण करीब वर्ष 1920 के आसपास कराया गया था. महल के विशाल आंगन में वह पिंडा आज भी मौजूद है. जहां राजा महावीर नारायण देव पूजा अर्चना किया करते थे.
यह स्थान आज भी स्थानीय लोगों के लिए आस्था और इतिहास का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है. राजा महावीर नारायण देव ने ही गांव में दुर्गा पूजा की परंपरा की शुरुआत कराई थी. तब से लेकर आज तक नंदूडीह में लगातार दुर्गा पूजा का आयोजन होता आ रहा है.
जो इस राजघराने की सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने का प्रतीक है. राजा महावीर नारायण देव की एकमात्र पौत्री का विवाह गिरिडीह जिले के जमखोखोडो गांव के राजा त्रिलोकी सिंह से हुआ था. वर्तमान में उनकी पुत्री सुनैना कुमारी इस ऐतिहासिक संपत्ति की देखरेख कर रही हैं और राजपरिवार की विरासत को संरक्षित रखने का प्रयास कर रही हैं.