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तस्लीमा नसरीन ने लगभग 20 साल बाद भारत की धरती पर कदम रखा है. इसे लेकर वह बहुत ही खुश हैं. उन्होंने कहा कि कोलकाता में लौटना अपने देश में लौटने जैसा है. तस्लीमा को आखिर क्यों 20 साल तक देश से बाहर रहना पड़ा? साल 2005 में उनके खिलाफ विरोध प्रदर्शन हुए. साल 2007 में उनके खिलाफ फतवा जारी हुआ. क्या है पूरा मामला? आइए जानते हैं.
तस्लीमा नसरीन ने 20 साल बाद भारत की धरती पर कदम रखे. (फोटो साभारः इंस्टाग्राम @taslima_nasreen1)
मुंबई. बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन लगभग 2 दशक बाद कोलकाता पहुंची हैं. उन्हें देश निकाला मिला हुआ था. नवंबर 2007 के बाद यह उनकी पहली यात्रा है. वह अपनी आत्मकथा के विमोचन के मौके पर कोलकाता के रवींद्र सदन में आयोजित एक साहित्यिक कार्यक्रम में शामिल होंगी. इस कार्यक्रम में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और भारतीय जनता पार्टी (BJP) की फायरब्रांड नेता सुवेंदु अधिकारी के भी शामिल होने की उम्मीद है. नसरीन की वापसी की पिछली सभी अपीलें बार-बार खारिज कर दी गई थीं, और राज्य में नई बनी सरकार ने लंबे समय से अटकी उनकी वापसी को मंजरी दी.
सोशल मीडिया पर वायरल हो रही तस्वीरों में तस्लीमा नसरीन को कोलकाता के नेताजी सुभाष चंद्र बोस इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर उतरते हुए देखा गया. वहां पहुंचने पर अधिकारियों ने उनका गर्मजोशी से स्वागत किया. ‘द टेलीग्राफ’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, कोलकाता में उतरने से पहले नसरीन ने उम्मीद जताई थी कि यह यात्रा अभिव्यक्ति की आजादी और असहमति की आवाज़ों की सुरक्षा के महत्व को फिर से स्थापित करेगी. उन्होंने कहा, “कोलकोता में लौटना ‘अपने देश’ में वापस आने जैसा महसूस हुआ.”
तस्लीमा नसरीन को क्यों छोड़ना पड़ा था देश
साल 2003 में, उनकी आत्मकथा ‘द्विखंडितो’ (Dwikhondito) के प्रकाशन के बाद भारी विवाद खड़ा हो गया था. इस किताब से कथित तौर पर लोगों की धार्मिक भावनाएं आहत हुई थी. लॉन्च के बाद शहर में हिंसक विरोध प्रदर्शन हुए, जिसके चलते तत्कालीन सरकार ने पश्चिम बंगाल में किताब के वितरण पर प्रतिबंध लगा दिया. साल 2005 में, कलकत्ता उच्च न्यायालय ने प्रतिबंध को रद्द कर दिया और फैसला सुनाया कि किताब का उद्देश्य धार्मिक भावनाओं को भड़काना नहीं था और सरकार का निर्णय अनुचित था. उस समय, कोलकाता में कट्टरपंथी समूहों ने कथित तौर पर उनके और किताब के खिलाफ लामबंदी शुरू कर दी थी.
तस्लीमा नसरीन के खिलाफ जारी हुआ था फतवा
हालांकि, साल 2007 में कोलकाता में फिर से विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए, जब चरमपंथी समूहों ने उन्हें शहर से बाहर निकालने की मांग की और आखिरकार सुरक्षा कारणों से सरकार को उन्हें शहर से बाहर भेजने के लिए मजबूर होना पड़ा. कुछ धार्मिक समूहों ने उनके खिलाफ ‘फतवा’ भी जारी किया और उन्हें देश से बाहर निकालने की मांग की. भारी अशांति और उथल-पुथल के बाद, नसरीन को आखिरकार नवंबर 2007 में देश छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा.
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रमेश कुमार, सितंबर 2021 से बतौर सीनियर सब एडिटर न्यूज18 हिंदी डिजिटल से जुड़े हैं. एंटरटेनमेंट डेस्क पर काम कर रहे हैं. समय-समय पर विधानसभा-लोकसभा चुनाव पर भी का…
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