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मट्ठा और गुड़ से घर पर बनाएं जैविक घोल, मिट्टी की उर्वरता...


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रासायनिक खाद का देसी विकल्प, मट्ठा और गुड़ से तैयार करें जैविक टॉनिक

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Agriculture Tips: मट्ठा और गुड़ से तैयार किया गया जैविक घोल प्राकृतिक खेती में मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने के लिए उपयोगी माना जाता है. यह घोल मिट्टी में लाभकारी सूक्ष्मजीवों की सक्रियता बढ़ाने, जैविक गतिविधियों को प्रोत्साहित करने और मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने में सहायक हो सकता है. कई किसान इसे रासायनिक खाद के विकल्प के रूप में भी अपनाते हैं. विशेषज्ञ सलाह के अनुसार, घोल को सही अनुपात में तैयार कर निर्धारित मात्रा में ही खेत में उपयोग करना चाहिए. नियमित उपयोग से मिट्टी की संरचना बेहतर बनी रहती है और फसलों की बढ़वार पर सकारात्मक प्रभाव देखने को मिल सकता है.

भीलवाड़ा: आज के आधुनिक दौर में किसान लगातार टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करते हुए नए-नए तकनीक को आजमा रहे हैं. जिससे किसान भी अब आधुनिक होने लगे हैं लेकिन अभी भी ऐसे कई देसी तरीका है. जो पारंपरिक तौर तरीकों से किसानों द्वारा अपनाई जा रहे हैं. जिसे देसी तरीका भी कहा जाता है. इन्हीं में से एक है मट्ठा और गुड़ से तैयार किया जाने वाला जैविक घोल हैं. यह घोल कम खर्च में बन जाता है और मिट्टी में मौजूद लाभदायक सूक्ष्म जीवों की संख्या बढ़ाने में मदद कर सकता है. जब मिट्टी में अच्छे सूक्ष्म जीव सक्रिय रहते हैं तो वे जैविक पदार्थों को धीरे-धीरे पौधों के लिए उपयोगी पोषक तत्वों में बदलने में योगदान देते हैं. इससे मिट्टी की गुणवत्ता बेहतर बनी रहती है और फसल की बढ़वार को भी सहारा मिलता है. यही वजह है कि कई किसान इस तरह के घरेलू जैविक घोल का इस्तेमाल अपनी खेती और किचन गार्डन में करते हैं.

इस जैविक घोल को तैयार करना बहुत आसान है. इसके लिए लगभग पांच लीटर साफ पानी लें. इसमें आधा लीटर ताजा मट्ठा और करीब 200 से 250 ग्राम गुड़ अच्छी तरह घोल दें. चाहें तो इस मिश्रण को प्लास्टिक की बाल्टी या ड्रम में भरकर ऊपर से ढक दें, लेकिन पूरी तरह बंद न करें ताकि हवा का थोड़ा आवागमन बना रहे. अब इस घोल को 2 से 3 दिन तक छायादार जगह पर रखें और दिन में 1 या 2 बार लकड़ी की डंडी से हिला दें. इस दौरान मिश्रण में नेचुरल रूप से किण्वन की प्रक्रिया शुरू होती है. जब हल्की खट्टी गंध आने लगे तो यह घोल इस्तेमाल के लिए तैयार माना जा सकता है. तैयार घोल को छानकर खेत, सब्जियों या बगीचे के पौधों में इस्तेमाल किया जा सकता है.

इस देसी  घोल का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह मिट्टी को लंबे समय तक जीवंत बनाए रखने में मदद करता है. मिट्टी में रहने वाले लाभदायक बैक्टीरिया और दूसरे सूक्ष्म जीव सक्रिय होने पर पौधों की जड़ों के आसपास का वातावरण बेहतर बनता है. इससे पौधे मिट्टी में मौजूद पोषक तत्वों का इस्तेमाल अधिक आसानी से कर सकते हैं. इसके अलावा मिट्टी की संरचना भी धीरे-धीरे बेहतर होती है और नमी बनाए रखने की क्षमता में भी सुधार आ सकता है. बरसात के मौसम में जब खेतों में जैविक गतिविधियां बढ़ती हैं, तब इस तरह का घोल और भी उपयोगी माना जाता है. यह तरीका कम लागत वाला है और छोटे किसानों के साथ-साथ घर पर किचन गार्डन बनाने वाले लोग भी इसे आसानी से अपना सकते हैं.

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इस घोल का इस्तेमाल भी सही तरीके से करना जरूरी है. तैयार घोल को सीधे पौधों में डालने की बजाय पहले इसमें तीन से चार गुना साफ पानी मिलाकर पतला कर लें. इसके बाद पौधों की जड़ों के पास या खेत की मिट्टी में इसका छिड़काव या सिंचाई के साथ उपयोग करें. सुबह या शाम के समय इसका प्रयोग करना बेहतर माना जाता है. बहुत अधिक मात्रा में बार-बार उपयोग करने से बचें और लगभग 15 से 20 दिन के अंतराल पर जरूरत के अनुसार इसका इस्तेमाल करें. अगर किसी फसल में पहले से कोई गंभीर रोग या कीट का प्रकोप हो तो केवल इस घोल पर निर्भर रहने के बजाय कृषि विभाग की सलाह भी लेना जरूरी है.

खेती में जैविक तरीकों को अपनाने से मिट्टी की सेहत लंबे समय तक बेहतर रखी जा सकती है. मट्ठा और गुड़ से तैयार यह देसी घोल भी ऐसे ही आसान उपायों में शामिल है, जिसे किसान अपने घर पर बहुत कम खर्च में बना सकते हैं. इसके साथ अगर खेत में गोबर की अच्छी तरह सड़ी हुई खाद, कम्पोस्ट और फसल अवशेषों का भी सही उपयोग किया जाए तो मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने में और मदद मिल सकती है. बरसात का मौसम ऐसे जैविक उपाय अपनाने के लिए अनुकूल माना जाता है, क्योंकि इस समय मिट्टी में नमी पर्याप्त रहती है. सही मात्रा, सही समय और नियमित देखभाल के साथ यह देसी जुगाड़ खेती की लागत कम करने और मिट्टी को स्वस्थ बनाए रखने में अच्छा होता हैं.



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