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झरुआ लड्डू खाया क्या, बिहार-झारखंड के बॉर्डर से उठकर विदेश तक पहुंचा...


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झरुआ लड्डू खाया क्या, बिहार-झारखंड के बॉर्डर से उठकर विदेश तक पहुंचा स्वाद

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झारखंड-बिहार सीमा पर स्थित अम्बा का ‘झरुआ लड्डू’ दुनियाभर में प्रसिद्ध है. चावल के आटे, बेसन और गुड़ से बनी यह पारंपरिक मिठाई करीब एक महीने तक खराब नहीं होती. अपनी लंबी शेल्फ लाइफ और बेहतरीन स्वाद के कारण इसकी मांग विदेशों तक है.

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मिठाई खाना किसे नहीं पसंद, लेकिन अलग अलग इलाकों में अलग अलग तरीके की मिठाई फेमस है. झारखंड और बिहार की सीमा पर स्थित अम्बा सिर्फ एक पड़ाव नहीं, बल्कि अपने अनोखे झरुआ लड्डू के कारण देशभर में प्रसिद्ध पहचान बन चुका है. गुड़ से बनी इस मिठाई का स्वाद इतना खास है कि यहां से गुजरने वाला लगभग हर यात्री इसे जरूर खरीदते हैं. 

दरअसल, झारखंड बिहार के बॉर्डर पर मिलने वाली इस मिठाई की मांग सिर्फ झारखंड और बिहार तक सीमित नहीं रही, बल्कि दिल्ली, मुंबई, कोलकाता जैसे महानगरों के साथ-साथ विदेशों तक पहुंच चुकी है. प्रवासी भारतीय भी अपने घरों की याद और देसी स्वाद के लिए अम्बा का झरुआ लड्डू मंगवाते हैं. यही वजह है कि यह स्थानीय मिठाई अब अंतरराष्ट्रीय पहचान बना रही है.

बता दे कि अम्बा के झरुआ लड्डू की सबसे बड़ी खासियत इसकी लंबी शेल्फ लाइफ है. सामान्य मिठाइयां कुछ दिनों में खराब हो जाती हैं, लेकिन यह लड्डू लगभग एक महीने तक बिना खराब हुए सुरक्षित रहता है. इसमें दूध या मावा का उपयोग नहीं किया जाता, इसलिए इसके जल्दी खराब होने की संभावना नहीं रहती. यही कारण है कि लोग इसे लंबी यात्राओं में साथ रखते हैं और विदेशों में रहने वाले अपने रिश्तेदारों तक भी आसानी से भेज देते हैं. स्वाद और गुणवत्ता लंबे समय तक बरकरार रहने से इसकी लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है.

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स्थानीय दुकानदार बताते है कि झरुआ लड्डू पूरी तरह पारंपरिक तरीके से तैयार किया जाता है. सबसे पहले चावल को अच्छी तरह पीसकर उसका महीन आटा बनाया जाता है. इसके साथ बेसन मिलाकर छोटी-छोटी बूंदी तैयार की जाती है. दूसरी ओर गुड़ का गाढ़ा पाग बनाया जाता है, जिसमें तैयार बूंदी को मिलाकर अच्छी तरह मिश्रित किया जाता है. स्वाद और खुशबू बढ़ाने के लिए इसमें सौंफ, नारियल और काजू भी डाले जाते हैं. इसके बाद हाथों से गोल आकार देकर लड्डू तैयार किए जाते हैं.

बता दें कि झरुआ लड्डू सिर्फ स्वादिष्ट ही नहीं, बल्कि पोषण से भी भरपूर माना जाता है. इसमें इस्तेमाल होने वाला गुड़ शरीर को प्राकृतिक ऊर्जा देता है और आयरन जैसे जरूरी तत्वों का अच्छा स्रोत माना जाता है. चावल और बेसन कार्बोहाइड्रेट तथा ऊर्जा प्रदान करते हैं, जबकि नारियल और काजू शरीर को अच्छे वसा और पोषक तत्व उपलब्ध कराते हैं. सौंफ पाचन में मदद करती है और स्वाद को भी बढ़ाती है. यही कारण है कि यह मिठाई केवल स्वाद के लिए ही नहीं, बल्कि पारंपरिक और पौष्टिक भोजन का भी एक अच्छा उदाहरण मानी जाती है.

राकेश कुमार पिछले लगभग 45 वर्षों से झरुआ लड्डू तैयार कर रहे हैं. उन्होंने बेहद छोटे स्तर से इस कारोबार की शुरुआत की थी. शुरुआती दिनों में यह लड्डू केवल 30 रुपये प्रति किलो बिकता था, लेकिन समय के साथ इसकी लोकप्रियता और मांग लगातार बढ़ती गई। आज इसकी कीमत 100 से 120 रुपये प्रति किलो तक पहुंच चुकी है. गुणवत्ता और पारंपरिक स्वाद को बनाए रखने की वजह से ग्राहकों का भरोसा भी लगातार बढ़ा है. चार दशकों की मेहनत ने इस मिठाई को अम्बा की पहचान बना दिया है.

स्थानीय लोग बताते है कि राष्ट्रीय राजमार्ग से गुजरने वाले हजारों यात्री अम्बा पहुंचकर इस प्रसिद्ध मिठाई को जरूर खरीदते हैं. कई लोग इसे अपने परिवार और दोस्तों के लिए उपहार के रूप में ले जाते हैं. इसकी लंबी शेल्फ लाइफ और किफायती कीमत इसे यात्रा के दौरान खरीदने के लिए आदर्श बनाती है. त्योहारों, शादी-ब्याह और विशेष अवसरों पर भी इसकी मांग बढ़ जाती है. धीरे-धीरे यह मिठाई सिर्फ स्थानीय बाजार तक सीमित नहीं रही, बल्कि दूर-दराज के शहरों में भी अपनी अलग पहचान बना चुकी है.

बता दें कि अम्बा का झरुआ लड्डू झारखंड और बिहार की साझा सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक बन चुका है. पारंपरिक विधि, शुद्ध सामग्री, लंबे समय तक सुरक्षित रहने की क्षमता और अनोखे स्वाद ने इसे खास पहचान दिलाई है. यही वजह है कि इसकी मांग देश की सीमाओं को पार कर विदेशों तक पहुंच गई है. आज यह मिठाई केवल खाने की चीज नहीं, बल्कि इस क्षेत्र की संस्कृति, मेहनत और परंपरा का प्रतिनिधित्व करती है. यदि इसे राष्ट्रीय स्तर पर और बेहतर पहचान मिले, तो आने वाले समय में अम्बा का झरुआ लड्डू भारत की पारंपरिक मिठाई है.

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