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सुल्तानपुर के कृषि वैज्ञानिक डॉ. सूर्य प्रकाश मिश्र ने किसानों को सहफसली खेती अपनाने की सलाह दी है. इस विधि में एक ही खेत में एक साथ दो या अधिक फसलों की वैज्ञानिक तरीके से खेती की जाती है. मक्का के साथ अरहर, गन्ने के साथ आलू और सरसों के साथ चना जैसी फसलों की खेती की जा सकती है. इससे संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल होने के साथ फसल खराब होने पर आर्थिक जोखिम भी कम किया जा सकता है.
सुल्तानपुर में कृषि वैज्ञानिक डॉ. सूर्य प्रकाश मिश्र ने सहफसली खेती के तरीकों और लाभों के बारे में जानकारी दी है. यह विधि किसानों को एक ही खेत में एक ही समय पर दो या दो से अधिक फसलें उगाने में मदद करती है, जिससे भूमि, पानी, धूप और पोषक तत्वों का बेहतर उपयोग होता है.
खेती की सहफसली विधि
कृषि विज्ञान केंद्र सुलतानपुर के कृषि वैज्ञानिक डॉ. सूर्य प्रकाश मिश्र ने लोकल 18 को बताया कि सहफसली खेती एक ऐसी कृषि पद्धति है जिसमें एक ही खेत में एक ही समय पर दो या दो से अधिक फसलों की वैज्ञानिक तरीके से खेती की जाती है. इसका मुख्य उद्देश्य भूमि, पानी, धूप और पोषक तत्वों का बेहतर उपयोग करना, उत्पादन बढ़ाना और किसानों की आय को संतुलित करते हुए जोखिम को कम करना है.
सहफसली खेती की प्रक्रिया
सहफसली खेती शुरू करने से पहले खेत की अच्छी तरह जुताई करके मिट्टी को भुरभुरी बनाना चाहिए. इसके बाद मिट्टी की जांच के अनुसार खाद और उर्वरकों का प्रयोग करना महत्वपूर्ण है. ऐसी फसलों का चयन करना चाहिए जिनकी पोषक तत्वों की आवश्यकता, जड़ों की गहराई और बढ़ने की गति अलग-अलग हो. उदाहरण के लिए, मक्का के साथ अरहर, गन्ने के साथ आलू, सरसों के साथ चना और कपास के साथ मूंग या उड़द की खेती की जा सकती है.
बुवाई और प्रबंधन के तरीके
फसलों की बुवाई उचित कतार दूरी और अनुपात में करनी चाहिए. सामान्यतः 2:1, 4:2 या 6:2 का कतार अनुपात अपनाया जाता है, ताकि दोनों फसलों को पर्याप्त धूप, हवा और पोषण मिल सके. बुवाई के समय प्रमाणित और स्वस्थ बीजों का उपयोग करें और बीजोपचार अवश्य करें. सिंचाई और उर्वरकों का प्रबंधन दोनों फसलों की आवश्यकता के अनुसार करें. खेत में खरपतवार नियंत्रण समय पर करें ताकि पोषक तत्वों की प्रतिस्पर्धा कम हो. कीट और रोगों की नियमित निगरानी करें तथा आवश्यकता पड़ने पर समेकित कीट प्रबंधन (IPM) अपनाएं.
सहफसली खेती के लाभ
किसान रवि कुमार ने लोकल 18 से बताया कि सहफसली खेती के कई लाभ हैं. इससे भूमि की उर्वरता बनी रहती है, कीट एवं रोगों का प्रकोप कम हो सकता है, और उत्पादन में स्थिरता आती है. यदि एक फसल किसी कारण से प्रभावित हो जाए तो दूसरी फसल से आय प्राप्त होती रहती है. दलहनी फसलों को शामिल करने से मिट्टी में नाइट्रोजन की मात्रा भी बढ़ती है, जिससे मिट्टी की सेहत में सुधार होता है.
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विवेक कुमार एक सीनियर जर्नलिस्ट हैं, जिन्हें मीडिया में 10 साल का अनुभव है. वर्तमान में न्यूज 18 हिंदी के साथ जुड़े हैं और हरियाणा, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की लोकल खबरों पर नजर रहती है. इसके अलावा इन्हें देश-…
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