नई दिल्ली: आत्मनिर्भर भारत की तरफ बढ़ते हुए अब ऐसा प्रोजेक्ट लॉन्च होने वाला है, जिसके बाद एनर्जी प्लांट्स के मामले में दूसरे देशों का मुंह देखने की जरूरत नहीं पड़ेगी. अभी तक भारत अपनी न्यूक्लियर एनर्जी की जरूरतें रूस, फ्रांस और अमेरिका जैसे देशों के जरिए पूरी करता था. हालांकि, अब 2033 तक देश में 5 ऐसे स्वदेशी ‘वज्रास्त्र’ तैयार कर चालू कर दिए जाएंगे, जो आने वाले समय में बिजली संकट की सूरत ही बदलकर रख देंगे. इस महा-मिशन के पूरा होते ही विदेशियों पर निर्भरता खत्म हो जाएगी और इसका सीधा सबूत हर भारतीय के घर में दिखाई देगा.
कैसे होंगे भारत के 5 ‘वज्रास्त्र’
न्यूक्लियर एनर्जी के क्षेत्र में अब तक दुनिया के गिने-चुने देशों की दादागिरी चलती आई है. भारत को भी अपने न्यूक्लियर पावर प्लांट्स और ईंधन के लिए हमेशा रूस, फ्रांस और अमेरिका जैसे देशों का मुंह देखना पड़ता था. हालांकि, अब ये निर्भरता हमेशा के लिए खत्म होने जा रही है. भारत ने एक ऐसा मास्टरस्ट्रोक खेला है, जिससे विदेशियों का खेल पूरी तरह खत्म हो जाएगा और देश में बिजली संकट का हमेशा के लिए पक्का इलाज हो जाएगा. भारत सरकार ने संसद में ऐलान किया है कि साल 2033 तक देश में कम से कम 5 पूरी तरह स्वदेशी स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर्स (SMRs) तैयार कर चालू कर दिए जाएंगे.
भारत में 2033 तक बिजली संकट का कैसे होगा पक्का इलाज?
ये कदम भारत के उस बड़े ड्रीम प्रोजेक्ट का हिस्सा है, जिसके तहत 2047 तक परमाणु ऊर्जा क्षमता को 100 गीगावाट (GWe) तक पहुंचाने का सपना देखा गया है.
अब तक भारत बड़े-बड़े परमाणु संयंत्रों पर निर्भर रहता था, जिन्हें बनाने में सालों लग जाते थे और जमीन से लेकर बजट तक की भारी समस्या आती थी. हालांकि, SMRs यानी ‘स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर्स’ आकार में छोटे, बेहद सुरक्षित और बहुत ही आधुनिक होते हैं.
इन्हें सीधे कारखानों में बनाकर किसी भी जगह आसानी से असेंबल किया जा सकता है. देश में जो पुराने कोयला और जीवाश्म ईंधन वाले बिजलीघर बंद हो रहे हैं, उनकी जगह पर इन छोटे रिएक्टर्स को फिट कर दिया जाएगा. इसके अलावा स्टील, सीमेंट जैसे भारी उद्योगों को 24 घंटे बिजली देने और देश के दूर-दराज के इलाकों में बिजली पहुंचाने के लिए ये रिएक्टर्स ‘वज्रास्त्र’ साबित होने वाले हैं.
‘मेक इन इंडिया’ धमाका!
भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर ने पूरी तरह स्वदेशी तकनीक से तीन अलग-अलग डिजाइन तैयार किए हैं. इनमें 220-मेगावाट का ‘भारत स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर’ (BSMR-200), 55-मेगावाट का ‘SMR-55’ और 5-मेगावाट तक का ‘हाई-टेम्परेचर गैस-कूल्ड रिएक्टर’ शामिल हैं.
इनमें से HTGCR तकनीक इतनी जबरदस्त है कि ये बिजली बनाने के साथ-साथ भविष्य के सबसे क्लीन ईंधन यानी हाइड्रोजन का उत्पादन भी करेगी. यानी विदेश से महंगा तेल और गैस मंगाने का झंझट भी धीरे-धीरे खत्म हो जाएगा.
अब तक किन देशों पर निर्भर था भारत?
भारत को अब तक दो बड़ी चीजों के लिए दूसरे देशों का मुंह देखना पड़ता था- न्यूक्लियर ईंधन (यूरेनियम) और आधुनिक रिएक्टर टेक्नोलॉजी.
- कजाकिस्तान और कनाडा: भारत अपने रिएक्टर्स चलाने के लिए यूरेनियम ईंधन का एक बड़ा हिस्सा कजाकिस्तान से मंगाता है. इसके अलावा कनाडा के साथ भी यूरेनियम सप्लाई का लंबा करार है.
- रूस: तमिलनाडु के कुडानकुलम में बने विशाल पावर प्लांट के लिए रूस ने ही रिएक्टर टेक्नोलॉजी (VVER-1000) दी है और वही इसके लिए ईंधन भी भेजता है.
- फ्रांस और अमेरिका: महाराष्ट्र के जैतापुर प्रोजेक्ट के लिए फ्रांस की तकनीक पर काम चल रहा है, वहीं अमेरिका से भी एडवांस रिएक्टर्स को लेकर बातचीत होती रही है.
- मेडिकल आइसोटोप्स: कैंसर के इलाज और जांच में काम आने वाले आइसोटोप्स के लिए भी भारत को कनाडा, नीदरलैंड्स और रूस से आयात करना पड़ता है.
अब भारतीय कंपनियां संभालेंगी कमान!
विदेशी कंपनियों पर निर्भरता पूरी तरह खत्म करने के लिए भारत सरकार ने ‘सस्टेनेबल हार्नेसिंग एंड एडवांसमेंट ऑफ न्यूक्लियर एनर्जी फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया’ यानी SHANTI Act, 2025 लागू किया है. इसके तहत अब भारत की प्राइवेट कंपनियां, बड़े बिजनेसमैन और स्टार्टअप्स भी परमाणु रिएक्टर बनाने, इंजीनियरिंग और रिसर्च के काम में हिस्सा ले सकेंगे. भारतीय कंपनियों ने तो रिएक्टर प्रेशर वेसल्स और कंट्रोल ड्राइव मैकेनिज्म जैसे अहम पुर्जे देश के अंदर ही बनाने शुरू भी कर दिए हैं. हालांकि, एटॉमिक एनर्जी रेगुलेटरी बोर्ड (AERB) पूरे नियमों और सुरक्षा पर सख्त नजर रखेगा ताकि सुरक्षा से कोई समझौता न हो.
थोरियम का ‘ब्रह्मास्त्र’
भारत के पास थोरियम का दुनिया में सबसे बड़ा खजाना मौजूद है. अब तक भारत को यूरेनियम के लिए दूसरे देशों के आगे गिड़गिड़ाना पड़ता था लेकिन भारत का तीन स्टेप्स वाला न्यूक्लियर प्रोग्राम धीरे-धीरे थोरियम की ओर बढ़ रहा है.
सरकार के मुताबिक, कल्पक्कम के कामिनी (KAMINI) रिएक्टर में थोरियम से बने ईंधन का सफल परीक्षण पहले ही किया जा चुका है. जैसे ही भारत थोरियम का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल शुरू कर देगा, वैसे ही अमेरिका, रूस या फ्रांस से यूरेनियम या तकनीक खरीदने की कोई मजबूरी नहीं रह जाएगी.