पलामू: हाथी जो कि सबसे बुद्धिमान जानवर माना जाता है. वहीं, पलामू क्षेत्र में कभी हाथी की पीठ पर जंगल सफारी का दौर हुआ करता था. 1970 से 80 के दशक के बीच झारखंड में जंगल सफारी का एक अलग ही रोमांच हुआ करता था. पलामू के बेतला क्षेत्र में पर्यटकों को जंगल की सैर कराने के लिए हाथियों का इस्तेमाल किया जाता था. इसके लिए शुरुआत में दो हाथी लाए गए थे और सुबह-शाम पर्यटक हाथी की पीठ पर बैठकर जंगल का भ्रमण करते थे. उस दौर में यह सफारी पर्यटकों के लिए आकर्षण का बड़ा केंद्र बन गया था.
कैंटीन से भलही तक होता था सफर
वाइल्ड लाइफ के जानकर डॉ. डी एस श्रीवास्तव ने लोकल 18 को बताया कि बेतला में हाथी की सफारी का अनोखा इतिहास रहा है. जहां शुरुआत में लोगों को हाथी से जंगल सफारी कराई जाती थी. सफारी कैंटीन से शुरू होकर रोड नंबर दो और तीन के जंक्शन होते हुए भलही तक जाती थी. करीब 5-6 किलोमीटर के इस सफर में पर्यटक जंगल को करीब से देखते थे. जिसके लिए लगभग 25 रुपए की टिकट लगती थी. उस जमाने में एक हाथी एक दिन में 2-3 ट्रिप तक करता था. हाथी सफारी के दौरान पर्यटकों को जंगल और वन्यजीवों को करीब से देखने का अवसर मिलता था. हालांकि वर्ष 2016 में हाथी सफारी को बंद कर दिया गया और इसके बाद पर्यटकों के लिए हाथियों की भूमिका काफी सीमित हो गई.
रजनी हथिनी की आज भी याद
उन्होंने कहा कि बेतला की हाथी विरासत की बात हो और रजनी का जिक्र न हो, ऐसा संभव नहीं है. वन्यजीव जानकार डॉ. डीएस श्रीवास्तव के अनुसार करीब 1976-77 में गुमला क्षेत्र से एक हाथी के बच्चे को बचाकर बेतला लाया गया था. उसका नाम रजनी रखा गया. छोटी उम्र से ही वह वनकर्मियों, महावतों और आसपास के बच्चों की चहेती बन गई थी. तत्कालीन फॉरेस्ट गार्ड राजेंद्र प्रसाद के पास वह दौड़कर पहुंच जाती थी. उसकी मासूमियत और मिलनसार व्यवहार ने उसे बेतला की पहचान बना दिया था. करीब 1980 के आसपास रजनी की मृत्यु हो गई, लेकिन उसकी याद आज भी पुराने वनकर्मियों और स्थानीय लोगों के बीच जीवित है.
जंगल प्रबंधन में हाथियों की है अहम भूमिका
उऩ्होंने कहा कि एक दौर में पलामू के जंगलों में लकड़ी, लाह और बीड़ी पत्ता जैसे वनोपज का बड़ा कारोबार होता था. जहां छिपादोहर में रेल हेड, लकड़ी डिपो और प्रशिक्षण केंद्र भी संचालित होते थे. घने जंगलों और दुर्गम इलाकों में जहां वाहन नहीं पहुंच पाते थे. वहां वनकर्मी हाथियों के सहारे गश्त और निगरानी करते थे. जंगल की सुरक्षा, वन प्रबंधन और वन्यजीव संरक्षण में हाथियों की भूमिका महत्वपूर्ण रही है. जो बेहद खास और किसी विरासत से कम नहीं है.
आज चार पालतू हाथी हैं मौजूद
उन्होंने कहा कि वर्तमान में पलामू टाइगर रिजर्व में जूही, राखी, सीता और मुर्गेश नाम के चार पालतू हाथी हैं. इनमें मुर्गेश नर हाथी है, जिसे कर्नाटक के बांदीपुर टाइगर रिजर्व से बेतला को उपहार में दिया गया था. राखी को बचाव अभियान के दौरान लाया गया था, जबकि उसकी मां की मौत आकाशीय बिजली गिरने से हुई था. सीता भी उपहार स्वरूप मिली हथिनी है. इन हाथियों के लिए विशेष शेड और देखभाल की व्यवस्था की गई है.
सफारी बंद, अब विरासत बचाने की चुनौती
उन्होंने कहा कि कभी जिन हाथियों की पीठ पर बैठकर पर्यटक जंगल का रोमांच महसूस करते थे, आज वही पालतू हाथी पर्यटकों के लिए लगभग शो-पीस बनकर रह गए हैं. इन हाथियों का उपयोग केवल पर्यटन तक सीमित नहीं होना चाहिए. जहां संभव हो, वन विभाग अपने संरक्षण और पेट्रोलिंग जैसे कार्यों में भी इनका उपयोग कर सकता है. वहीं, पर्यटकों को हाथियों की कहानी, उनकी भूमिका और बेतला की इस अनूठी विरासत से परिचित कराने के लिए सूचना बोर्ड और अन्य सुविधाएं विकसित की जा रही हैं. कभी जंगल सफारी की पहचान रहे ये हाथी आज बेतला के इतिहास और वन प्रबंधन की एक जीवंत विरासत बन चुके हैं.