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पलामू में किसान अब आधुनिक खेती के साथ पुरानी कृषि परंपराओं को भी अपना रहे हैं. जिससे मोटे अनाज की खेती आय का नया जरिया बन रही है. चैनपुर प्रखंड की कुंती देवी ने रागी की खेती शुरू की है. जिसे सरकार भी बढ़ावा दे रही है.
पलामूः आज के बदलते दौर और खान पान की परंपरा में किसान आधुनिक खेती के साथ अपनी पुरानी कृषि परंपराओं को भी दोबारा अपना रहे हैं. स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता और बाजार में मांग बढ़ने के कारण मोटे अनाज की खेती किसानों के लिए आय का नया जरिया बन रही है. सरकार भी मोटे अनाज की खेती को बढ़ावा देने के लिए किसानों को प्रशिक्षण, बीज और अन्य स्तर पर प्रोत्साहित कर रही है. इसका असर पलामू के ग्रामीण क्षेत्रों में भी देखने को मिल रहा है.
बता दें कि चैनपुर प्रखंड की महिला किसान कुंती देवी भी मोटे अनाज की खेती को लेकर उत्साहित हैं. उन्होंने अपने खेत में रागी यानी मंडुआ की खेती शुरू की है. कुंती देवी ने लोकल18 को बताया कि बचपन में उनके घर में मंडुआ की खेती होती थी. मायके में भी उन्हें इसकी खेती के तरीके और उपयोग की जानकारी थी. हालांकि समय के साथ इसकी खेती बंद हो गई थी. अब प्रशिक्षण मिलने के बाद उन्होंने दोबारा रागी की खेती शुरू की है.
कुंती देवी ने आग कहा कि उन्हें आत्मा की ओर से रागी का बीज मिला, जिसे उन्होंने दो कट्ठे जमीन में लगाया है. फसल के शुरुआती दिनों में जब पौधे निकलने लगे तो गांव के कई लोग इसे घास समझ रहे थे. लेकिन कुंती देवी पहले से रागी की खेती के बारे में जानती थीं, इसलिए उन्हें भरोसा था कि यह रागी का पौधा है. उनके परिवार में पहले भी मोटे अनाज की खेती और सेवन होता था. मक्के का घटा, ज्वार की रोटी और मंडुआ की रोटी जैसे पारंपरिक खाद्य पदार्थ ग्रामीण जीवन का हिस्सा रहे हैं.
आगे कहा कि प्रशिक्षण के दौरान उन्हें मोटे अनाज के पोषण और खेती के फायदे के बारे में और जानकारी मिली. गेहूं और चावल के मुकाबले मोटे अनाज को भोजन में शामिल करना स्वास्थ्य के लिहाज से काफी फायदेमंद है. यही कारण है कि अब वह दोबारा इसकी खेती कर रही हैं. अगर इस साल रागी की उपज अच्छी रहती है और बाजार में उचित कीमत मिलती है तो वह आने वाले वर्षों में बड़े क्षेत्र में इसकी खेती करने की योजना बना रही हैं.
बता दें कि रागी की बढ़ती मांग किसानों के लिए बाजार की नई संभावना भी पैदा कर रही है. भारत सरकार ने खरीफ विपणन सीजन 2026-27 के लिए रागी का न्यूनतम समर्थन मूल्य 5,205 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है, जबकि उत्पादन लागत 3,470 रुपये प्रति क्विंटल आंकी गई है. वहीं अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी फिंगर मिलेट यानी रागी की मांग बढ़ रही है. जहां 2026 में भारतीय रागी के पूरे दाने की कुछ निर्यात कीमतें करीब 420 से 560 डॉलर प्रति टन के संकेत देती हैं. यानी भारतीय मुद्रा में लगभग 36 से 48 रुपये प्रति किलो के बराबर निर्यात मूल्य बैठता है, हालांकि वास्तविक कीमत गुणवत्ता, सफाई, पैकेजिंग, प्रमाणन और निर्यातक के अनुसार बदलती है.
कृषि वैज्ञानिक डॉ. प्रमोद कुमार ने कहा कि अगर एक एकड़ में लगभग 8-10 क्विंटल रागी की उपज मानें और एमएसपी 5,205 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से बिक्री हो तो सकल आय करीब 50 हजार से 60 हजार रुपए कमा सकते है. 52,050 रुपये हो सकती है. उन्होंने बताया कि इसकी खेती में 15 से 20 हजार प्रति एकड़ लागत लग सकता है. बेहतर उपज और स्थानीय या प्रीमियम बाजार में अधिक कीमत मिलने पर यह मुनाफा और बढ़ सकता है.
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प्रसून सिंह को मीडिया में 7 साल काम करने का अनुभव है. खबरों को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर रोचक अंजाद में पेश करना खासियत है. दैनिक भास्कर अखबार में इंटर्नशिप के साथ करियर की शुरुआत हुई.
इसके बाद ETV Bharat (बिहार)…
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