दुनिया का सबसे अमीर बिजनेस हब माना जाने वाला दुबई आजादी से पहले तक भारत के कंट्रोल में था. 20वीं सदी की शुरुआत में दुबई, कुवैत, कतर और यमन जैसे देशों का शासन दिल्ली से चलता था. वहां भारतीय अफसर तैनात थे और भारतीय रुपया ही करेंसी के रूप में चलता था. 1 अप्रैल 1947 को एक सीक्रेट लेटर के जरिए खाड़ी देशों का कंट्रोल भारत से छीनकर लिया गया. अगर 1947 में ये फैसला न हुआ होता, तो आज दुबई, अबू धाबी और मिडिल ईस्ट के तेल भंडार भारत का हिस्सा होते. इससे दुनिया का पावर बैलेंस पूरी तरह बदल गया होता.
दुबई के कोने-कोने पर था भारत का कंट्रोल
दुनिया के सबसे अमीर और आलीशान शहरों की बात आते ही सबसे पहले दुबई का ही नाम याद आता है. आसमान छूती इमारतें, चमचमाती सड़कें और दुनिया भर के कारोबार का सबसे बड़ा सेंटर! जिस दुबई को आज पूरी दुनिया ग्लोबल बिजनेस हब मानती है, वो इतिहास के एक मोड़ पर भारत का हिस्सा बन सकता था. सोचिए, अगर आज दुबई भारत में होता तो पूरे एशिया का पावर बैलेंस ही बदल गया होता. लेकिन 1947 में आजादी से ठीक पहले लिए गए एक फैसले ने सब कुछ बदलकर रख दिया.
ये इतिहास का वो पन्ना है, जिसके बारे में आज के दौर में बहुत कम लोगों को जानकारी है. आज से करीब 80 साल पहले तक मिडिल ईस्ट के कई बड़े इलाके नई दिल्ली के प्रशासन से सीधे जुड़े हुए थे. दुबई से लेकर कुवैत तक का इलाका भारतीय अफसरों और सैनिकों के दम पर कंट्रोल होता था. वहां भारतीय रुपया चलता था और कानून की अंतिम जवाबदेही भारत के वायसराय के पास होती थी. हालांकि, आजादी से महज कुछ महीने पहले एक ऐसा प्रशासनिक फैसला लिया गया, जिसने पूरी दुनिया का नक्शा, इतिहास और पावर बैलेंस हमेशा-हमेशा के लिए बदलकर रख दिया.
इतिहास का वो पन्ना: जब दिल्ली से कंट्रोल होता था पूरा अरब!
आज जब भारत और खाड़ी देशों के रिश्तों की बात होती है, तो ये सोचकर भी हैरानी होती है कि 20वीं सदी की शुरुआत में पूरे अरब का करीब एक-तिहाई हिस्सा ब्रिटिश भारत के प्रशासन के तहत आता था. ओमान, कुवैत, बहरीन, कतर, यूएई यानी दुबई-अबू धाबी और यमन जैसे इलाकों का सीधा राजनीतिक और प्रशासनिक कंट्रोल दिल्ली में बैठे अधिकारियों के हाथ में था.
मशहूर इतिहासकार और लेखक सैम डेलरिंपल के शोध और ऐतिहासिक दस्तावेजों के मुताबिक, उस दौर में खाड़ी के इन इलाकों की सुरक्षा और प्रशासनिक व्यवस्था पूरी तरह से भारतीय तंत्र पर निर्भर थी.
- भारतीय सैनिकों की तैनाती: मिडिल ईस्ट की सीमाओं और समुद्री रास्तों की सुरक्षा में भारतीय सैनिकों की मुख्य भूमिका होती थी.
- Indian Political Service का राज: वहां का पूरा प्रशासनिक ढांचा ‘इंडियन पॉलिटिकल सर्विस’ (IPS) के अधिकारी चलाते थे. खाड़ी में तैनात ब्रिटिश रेजिडेंट्स का करियर सीधे भारत के प्रशासनिक ढांचे से जुड़ा हुआ था.
- वायसराय का अंतिम फैसला: खाड़ी के छोटे-बड़े अरब शेखों और सुल्तानों के प्रशासनिक मामलों की आखिरी फाइल भारत के वायसराय के दफ्तर तक ही जाती थी.
आलम तो ये था कि ओमान के सुल्तान ने भारत के राजस्थान में पढ़ाई की थी और उन्हें अरबी के मुकाबले उर्दू भाषा पर ज्यादा पकड़ थी. इतना ही नहीं, यमन का ऐतिहासिक शहर एडन तो बाकायदा ‘बॉम्बे प्रेसीडेंसी’ का ही एक हिस्सा माना जाता था. स्थिति ये थी कि एडन तक जाने वाले यात्रियों के लिए भारतीय प्रशासन ही पासपोर्ट जारी किया करता था.
करेंसी भी अपनी: जब खाड़ी में चलता था सिर्फ भारतीय रुपया
ब्रिटिश भारत का ये दबदबा केवल पुलिस, सेना और प्रशासनिक अफसरों तक सीमित नहीं था, बल्कि खाड़ी क्षेत्र की आधिकारिक मुद्रा ही भारतीय रुपया हुआ करती थी. आज भले ही दुबई में दिरहम और कुवैत में दीनार चलता हो, लेकिन 20वीं सदी के शुरुआती दशकों में दुबई, अबू धाबी, कतर और कुवैत के बाजारों में हर छोटा-बड़ा सौदा भारतीय रुपयों में ही होता था.
व्यापारिक नजरिए से देखें तो समुद्री यात्रा और माल की ढुलाई के लिए ‘ब्रिटिश इंडिया लाइन’ सबसे अहम माध्यम थी. करीब 30 अरब रियासतों में तैनात ब्रिटिश रेजिडेंट्स सीधे दिल्ली से दिशा-निर्देश लेते थे. यानी आज जिस खाड़ी को हम भारत से हजारों किलोमीटर दूर एक अलग दुनिया मानते हैं, उसके प्रशासन, व्यापार, कानून और रोजमर्रा की व्यवस्था में कभी भारत की गहरी और अटूट मौजूदगी हुआ करती थी.
1 अप्रैल 1947: एक सीक्रेट लेटर और बंद हो गया इतिहास का रास्ता
अब सवाल ये उठता है कि जब खाड़ी का इतना बड़ा हिस्सा ब्रिटिश भारत से जुड़ा था, तो फिर ये ऐतिहासिक रिश्ता टूटा कैसे? और दुबई भारत का हिस्सा बनने से कैसे रह गया?
ये कहानी सिर्फ किसी के मना करने की नहीं है, बल्कि आजादी के समय ब्रिटिश सरकार और तत्कालीन भारतीय प्रशासन की सोच की भी है. 1947 में जब भारत और पाकिस्तान की आजादी की रूपरेखा तैयार की जा रही थी, तब ब्रिटिश अधिकारियों के बीच ये चर्चा शुरू हुई कि आजादी के बाद फारस की खाड़ी की राजनीतिक और सैन्य जिम्मेदारी कौन संभालेगा? क्या नया भारत या पाकिस्तान इस जिम्मेदारी को लेने के लिए तैयार होंगे?
कतर की नेशनल लाइब्रेरी में रखी एक सीक्रेट फाइल और 30 अप्रैल 1947 को नई दिल्ली से लंदन स्थित ‘इंडिया ऑफिस’ को भेजी गई एक गोपनीय चिट्ठी से इस राज पर से पर्दा उठता है.
- सीक्रेट लेटर का खुलासा: उस सीक्रेट लेटर में साफ दर्ज था कि तत्कालीन ‘Government of India’ इस बात पर सहमत है कि फारस की खाड़ी के अरब राज्यों का सीधा राजनीतिक नियंत्रण भारत सरकार की व्यवस्था से निकालकर सीधे ब्रिटेन की होम गवर्नमेंट को सौंप दिया जाए.
- 1 अप्रैल 1947 की तारीख: इस फैसले की प्रभावी तारीख 1 अप्रैल 1947 तय की गई.
- रास्ता बंद हो गया: यानी भारत की आजादी से महज चार महीने पहले ही खाड़ी के इन सभी इलाकों का प्रशासनिक नाता भारत से तोड़ दिया गया.
अगर 1 अप्रैल 1947 को यह प्रशासनिक विभाजन न हुआ होता, तो 15 अगस्त 1947 को जब देश की 500 से ज्यादा रियासतों जैसे जयपुर, हैदराबाद, बहावलपुर का भारत या पाकिस्तान में विलय हो रहा था, तब दुबई, अबू धाबी और कुवैत जैसी रियासतों के सामने भी यही विकल्प होता. और हो सकता था कि आज का दुबई भारत के नक्शे में शामिल होता!
अगर दुबई भारत में होता, तो कैसा होता दुनिया का ‘पावर बैलेंस’?
अगर 1947 में वह एक प्रशासनिक फैसला अलग लिया गया होता और आज दुबई, अबू धाबी या कतर भारत का हिस्सा होते तो आज पूरी दुनिया का पावर बैलेंस कैसा दिखाई देता?
- ऊर्जा और तेल पर भारत का राज: दुनिया के सबसे विशाल तेल और प्राकृतिक गैस के भंडार कुवैत, यूएई, कतर भारत की भौगोलिक सीमा के भीतर होते. भारत को अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए कभी दूसरे देशों पर निर्भर नहीं रहना पड़ता और न ही डॉलर का दबाव सहना पड़ता.
- दुनिया का सबसे बड़ा इकोनॉमिक हब: आज जिस दुबई को दुनिया का व्यापारिक और वित्तीय केंद्र माना जाता है, वह मुंबई के साथ मिलकर भारत की आर्थिक ताकत को कई गुना बढ़ा देता. दुनिया की बड़ी-बड़ी टेक और रियल एस्टेट कंपनियां भारत के इस हिस्से में निवेश कर रही होतीं.
- रणनीतिक और समुद्री सुपरपावर: फारस की खाड़ी और ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ जैसे दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील समुद्री व्यापारिक मार्गों पर भारत का सीधा कंट्रोल होता. इसके दम पर भारत दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य और रणनीतिक महाशक्ति बनकर उभरता.