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कुछ चीजों को छोड़ दें तो इंसानों और जानवरों के बहुत से काम मिलते-जुलते हैं. दोनों ही जीव खाना खाने से लेकर सांस लेने, पानी पीने और प्रजनन आदि का काम करते हैं. ऐसे में जब काफी चीजें समान हैं तो बदलते मौसम का असर भी दोनों पर पड़ता है. मौसम अपना रंग बदल रहा है और ठंड ने आहट देना शुरू कर दिया है. शाम के समय निकलने वाले कई लोगों ने फुल कपड़े और मोटे कपड़े और जैकेट निकाल लिया है. पशुओं पर भी इस मौसम का असर पड़ने लगा है. इससे उनकी सेहत और दुग्ध उत्पादन दोनों प्रभावित होता है.
देवघर: धीरे-धीरे ठंड ने दस्तक देना शुरू कर दिया है. सुबह और शाम के समय तापमान में गिरावट देखने को मिल रही है. ऐसे में बदलते मौसम का असर इंसानों पर तो पड़ ही रहा है. इसके साथ ही यह मौसम पशुओं को भी बीमार कर रहा है. सर्दियों के मौसम में पशुओं को कई तरह की दिक्कतें होती है. ठंड बढ़ने से पशु अगर ठंड के शिकार हो गए तो उनके दूध देने की मात्रा घट जाती है. दूघ घटने से पशुपालकों की आमदनी भी घट जाती है क्योंकि दूध बेचकर उनकी आय होती है. ऐसे में पशुपालक यदि समय रहते सजग हो जाते हैं तो उनके जानवर पर बदलते मौसम का असर नहीं पड़ेगा.
क्या कहते हैं पशु चिकित्सक
देवघर कृषि विज्ञान केंद्र में पदस्थापित पशु चिकित्सक सह केंद्र प्रमुख डॉ. पूनम सोरेन ने लोकल 18 के संवाददाता से बातचीत करते हुए कहा कि ठंड के दिनों में गाय, भैंस जैसे दुधारू पशुओं की देखभाल पर विशेष ध्यान देने की जरूरत होती है. दूध कम होने के पीछे कई कारण हो सकते हैं. इनमें पशुओं को पर्याप्त और संतुलित आहार नहीं मिलना, ठंड का असर और रहने की जगह में उचित व्यवस्था नहीं होना भी शामिल है. अगर पशुओं को उनकी जरूरत के हिसाब से भोजन नहीं मिलता है तो इसका असर दूध उत्पादन पर पड़ सकता है. इसलिए पशुपालकों को केवल चारा खिलाने पर ही ध्यान नहीं देना चाहिए, बल्कि यह भी देखना चाहिए कि पशुओं को पर्याप्त पोषण मिल रहा है या नहीं. खासकर सर्दियों में उनके खानपान में जरूरी बदलाव करना फायदेमंद हो सकता है.
हफ्ते में तीन दिन खाने में शामिल करें यह चीज
डॉ. पूनम सोरेन के मुताबिक, ठंड के मौसम में पशुओं के आहार में सरसों की खली और तिल की खली शामिल की जा सकती है. पशुपालक सप्ताह में कम से कम तीन दिन इसे पशुओं के आहार में दे सकते हैं. इन खलियों में पोषक तत्व होते हैं, जो पशुओं की पोषण संबंधी जरूरतों को पूरा करने में मदद करते हैं. हालांकि, इन्हें पशु की उम्र, वजन, दूध देने की मात्रा और पहले से दिए जा रहे आहार को ध्यान में रखकर उचित मात्रा में ही खिलाना चाहिए. जरूरत से ज्यादा खली खिलाना भी ठीक नहीं है. इसलिए पशुपालकों को पशु चिकित्सक की सलाह के अनुसार ही इसकी मात्रा तय करनी चाहिए. इसके साथ हरा चारा, सूखा चारा और पर्याप्त साफ पानी देना भी जरूरी है. केवल एक चीज खिलाने से दूध बढ़ने की गारंटी नहीं होती, बल्कि संतुलित आहार और सही देखभाल का संयुक्त असर पड़ता है.
पुआल से ढंके गौशाला की छत
खानपान के साथ पशुओं के रहने की जगह पर ध्यान देना भी बेहद जरूरी है. ठंड के मौसम में अगर गौशाला में तेज हवा आती है या पशु गीली जगह पर रहते हैं, तो उन्हें परेशानी हो सकती है. ऐसे में पशुपालकों को गौशाला की ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए, जहां ठंडी हवा सीधे पशुओं को न लगे.जरूरत के अनुसार गौशाला के खुले हिस्सों को पर्दे या दूसरी सुरक्षित व्यवस्था से ढका जा सकता है.साथ ही छत की व्यवस्था भी ऐसी होनी चाहिए कि ठंडी हवा और बारिश का पानी अंदर न आए. लेकिन गौशाला को पूरी तरह हवा बंद नहीं करना चाहिए, क्योंकि पशुओं के लिए पर्याप्त वेंटिलेशन भी जरूरी है.फर्श सूखा और साफ रखना चाहिए तथा गोबर और गंदगी की नियमित सफाई करनी चाहिए.गौशाला में पानी जमा होने से भी रोकना चाहिए, ताकि पशु गीली जमीन पर रहने से बच सकें. अगर पशुपालक डाइट और व्यवस्था में कुछ बदलाव करते हैं तो निश्चित तौर पर दुधारू पशु अपने दूध में कमी नहीं करेंगे और पशुपालक के पॉकेट पर कोई खास असर नहीं पड़ेगा.
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