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Ranchi News: राजस्थान के अलवर से रोजी-रोटी की तलाश में रांची आए इस परिवार के पास बच्चे को संभालने वाला कोई नहीं है. पेट पालने के लिए काम पर जाना जरूरी है. बेटे को अकेला छोड़ना मुमकिन नहीं. लिहाजा, मां-बाप अपने कलेजे के टुकड़े को भी साथ लेकर ड्यूटी पर निकलते हैं. एक तरफ शहर को साफ रखने की जिम्मेदारी है, तो दूसरी तरफ उस नन्ही जान को सुरक्षित रखने की चिंता.
बच्चे के लिए ट्रैक्टर पर झूला बांधा.
रांचीः किसी बच्चे का पहला झूला घर के किसी कोने में टंगा होता है, लेकिन राजस्थान के अलवर से रांची आए अर्जुन और लीला के बेटे का झूला नगर निगम के ट्रैक्टर पर टंगा है. ट्रैक्टर के पीछे शहर का कचरा लदा होता है. आगे स्टेयरिंग के सामने दो महीने का बच्चा झूले में लेटा रहता है. अर्जुन ट्रैक्टर चलाते हैं और बीच-बीच में एक हाथ से झूला भी झुला देते हैं. यह तस्वीर एक परिवार की मजबूरी और रोजी-रोटी के लिए किए जा रहे संघर्ष को दिखाती है.
अलवर से रांची आए, अब नगर निगम में करते हैं काम
29 साल के अर्जुन और 24 साल की लीला राजस्थान के अलवर के रहने वाले हैं. तकरीबन ढाई महीने पहले दोनों काम की तलाश में एक समूह के साथ रांची आए थे. अब वे रांची नगर निगम में आउटसोर्सिंग के तहत सफाईकर्मी के तौर पर काम करते हैं. इसी बीच उनके घर बेटे ने जन्म लिया. बच्चे के आने से परिवार में खुशी तो आई, लेकिन उसके साथ एक बड़ी परेशानी भी खड़ी हो गई. जब दोनों काम पर जाएंगे, तो बच्चे को कौन संभालेगा?
परिवार में देखभाल करने वाला कोई नहीं
अर्जुन बताते हैं कि रांची में उनका कोई परिवार नहीं है, जो बच्चे की देखभाल कर सके. ऐसे में दो महीने के बेटे को घर पर अकेला छोड़ना संभव नहीं है. दूसरी ओर, परिवार चलाने के लिए दोनों का काम करना भी जरूरी है. इसी मजबूरी में बच्चा भी मां-बाप के साथ ड्यूटी पर जाने लगा.
स्टेयरिंग के सामने बांधा बेटे का झूला
लीला बच्चे को गोद में लेकर काम पर निकलती हैं, जबकि अर्जुन ने ट्रैक्टर के स्टेयरिंग के सामने उसके लिए झूला बांध रखा है. सुनने में यह एक जुगाड़ लग सकता है, लेकिन इसके पीछे परिवार की मजबूरी है. दोनों के सामने रोजी-रोटी कमाने और बच्चे की देखभाल करने की दोहरी चुनौती है. हालांकि, कचरा ढोने वाले ट्रैक्टर पर बच्चे को रखना उसके स्वास्थ्य और सुरक्षा को लेकर चिंता भी बढ़ाता है. लीला को डर रहता है कि कहीं गंदगी की वजह से बच्चे को संक्रमण न हो जाए.
मां को संक्रमण का डर, लेकिन दूसरा रास्ता नहीं
लीला कहती हैं कि उन्हें बच्चे की सेहत की चिंता रहती है. वह बताती हैं कि कचरे की वजह से संक्रमण का डर बना रहता है, इसलिए बच्चे का खास खयाल रखना पड़ता है. लेकिन परिवार के पास फिलहाल कोई दूसरा उपाय नहीं है. बच्चे को दूध पिलाने के लिए उन्हें खुद भी स्वस्थ रहना जरूरी है. एक तरफ लीला शहर की सफाई का काम करती हैं, दूसरी तरफ बेटे को संक्रमण से बचाने और उसकी देखभाल करने की कोशिश करती हैं. अर्जुन के सामने भी ट्रैक्टर चलाने के साथ परिवार की जिम्मेदारी निभाने की चुनौती है.
शहर साफ रखने वाले परिवार की अपनी जद्दोजहद
रांची की सड़कों से कचरा उठाने वाले अर्जुन और लीला शहर को साफ रखने का काम करते हैं. लेकिन अपने छोटे से बच्चे की देखभाल के लिए उन्हें काम की जगह पर ही इंतजाम करना पड़ रहा है. ट्रैक्टर के स्टेयरिंग के सामने टंगा झूला उनकी मजबूरी की कहानी कहता है.
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