BJP and Sharad Pawar Relation: महाराष्ट्र में विधान परिषद चुनाव में कुछ सीटों पर मिली हार और राष्ट्रीय राजनीति में चुनाव आयोग को लेकर विपक्ष की आक्रामकता के बीच भाजपा एक बड़ा राजनीतिक दांव खेलने की तैयारी में है. वह महाराष्ट्र की राजनीति के चाणक्य कहलाने वाले वयोवृद्ध नेता शरद पवार को फिर से साधने में जुटी है. पार्टी फिर से महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े विधेयकों को संसद की मंजूरी दिलाने की रणनीति पर काम कर रही है. इसी कारण वह एनसीपी के दोनों धड़ों के विलय और लोकसभा में एनसीपी (शरद पवार) गुट के सांसदों को अपने पक्ष में करने की कोशिश में जुटी है.
शरद पवार की याद क्यों आई?
इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक भाजपा की इस नई रणनीति के पीछे दो बड़ी वजहें हैं. पहली, संसद में महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े विधेयकों को पारित कराने के लिए जरूरी समर्थन जुटाना. दूसरी, महाराष्ट्र में कांग्रेस के कथित पर बढ़ते राजनीतिक प्रभाव को रोकने के लिए क्षेत्रीय दलों को अपने साथ जोड़ना. शरद पवार इन दोनों ही मोर्चों पर भाजपा के लिए अहम हो सकते हैं. भाजपा के रणनीतिकारों की नजर एनसीपी (शरदचंद्र पवार) के आठ लोकसभा सांसदों पर है. पार्टी का मानना है कि इन सांसदों का समर्थन महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराने के गणित में निर्णायक हो सकता है. यही वजह है कि भाजपा अब वैचारिक मतभेदों को किनारे रखकर क्षेत्रीय दलों से बातचीत का रास्ता तलाश रही है.
दरअसल, लोकसभा में इस विधेयक को पारित कराने के लिए कम से कम दो-तिहाई समर्थन की जरूरत होती है. इसी साल संसद के विशेष सत्र में इस विधेयक का 298 सांसदों ने समर्थन और 230 ने विरोध किया. दो तिहाई बहुमत के अभाव में विधेयक पास नहीं सका. ऐसे में सरकार पहले ही टीएमसी और शिवसेना उद्धव गुट के कई सांसदों को एनडीए के पाले में ला चुकी है. उसकी नजर एनसीपी शरद गुट और अन्य छोटे-छोटे दलों के सांसदों पर है.
मोदी का फोन और अमित शाह की मुलाकात
शरद पवार के साथ भाजपा की बढ़ती राजनीतिक नजदीकी के संकेत हाल की दो घटनाओं से मिले हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अस्पताल में भर्ती शरद पवार को फोन कर उनका हालचाल पूछा. बताया गया कि प्रधानमंत्री ने उन्हें आराम करने की सलाह भी दी. दूसरी तरफ केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने दिल्ली में एनसीपी के नेताओं के एक प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात की. इसे महज शिष्टाचार नहीं माना जा सकता. महाराष्ट्र में भाजपा और एनसीपी के बीच राजनीतिक समीकरण बदलने की चर्चाएं पहले से चल रही हैं. ऐसे में इन घटनाओं ने एनसीपी के दोनों धड़ों के संभावित विलय की अटकलों को भी हवा दी है.
कांग्रेस को घेरने के लिए क्षेत्रीय दलों पर नजर
भाजपा की इस कवायद का एक बड़ा मकसद कांग्रेस को राजनीतिक रूप से घेरना भी है. पिछले कुछ समय से कांग्रेस चुनाव आयोग, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर और कथित वोट चोरी के आरोपों को लेकर लगातार हमलावर है. विपक्षी दलों के इस अभियान ने राष्ट्रीय राजनीति में चुनाव आयोग की भूमिका को बड़ा मुद्दा बना दिया है.
भाजपा ने भी कांग्रेस के खिलाफ लोकतंत्र बचाओ जैसे अभियानों के जरिए जवाब देने की कोशिश की है. लेकिन यह पर्याप्त नहीं है. क्षेत्रीय दलों को साथ लाना होगा. महाराष्ट्र में शरद पवार की राजनीतिक पकड़ इसी वजह से महत्वपूर्ण हो जाती है. उनका राज्य में लंबा राजनीतिक अनुभव और अलग-अलग दलों के नेताओं से संपर्क भाजपा के लिए उपयोगी हो सकता है. पार्टी को लगता है कि क्षेत्रीय दलों के साथ बेहतर तालमेल से कांग्रेस के राजनीतिक प्रभाव को सीमित करने में मदद मिल सकती है.
नागपुर में हार ने भाजपा को क्यों चौंकाया?
महाराष्ट्र विधान परिषद की पांच सीटों के चुनाव ने भाजपा और उसके सहयोगियों की चिंता बढ़ा दी है. इन चुनावों में महाविकास अघाड़ी ने तीन सीटें जीतीं, जबकि सत्तारूढ़ महायुति को दो सीटें मिलीं. भाजपा को सबसे बड़ा झटका नागपुर में लगा. यह मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी का गृह क्षेत्र है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मुख्यालय भी यहीं है.
नागपुर स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में कांग्रेस के मौजूदा विधान परिषद सदस्य अभिजीत वंजारी ने भाजपा के सुधाकर कोहले को हराया. वंजारी ने 67,231 वोट हासिल किए, जबकि भाजपा उम्मीदवार को 63,960 वोट मिले. इस तरह भाजपा को करीब 3,271 वोटों से हार का सामना करना पड़ा.
दूसरी तरफ शरद पवार की एनसीपी (एसपी) ने पुणे और छत्रपति संभाजीनगर की स्नातक सीटों पर जीत दर्ज की. इन दोनों जीतों ने यह भी दिखाया कि महाराष्ट्र में शरद पवार की राजनीतिक पकड़ अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है.
शरद पवार को साधना कितना मुश्किल?
शरद पवार को महाराष्ट्र की राजनीति का चाणक्य कहा जाता है. इसकी वजह सिर्फ उनका लंबा राजनीतिक अनुभव नहीं, बल्कि बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच अपनी भूमिका बनाए रखने की उनकी क्षमता भी है. वह कांग्रेस के साथ रहे, अपनी पार्टी बनाई और अलग-अलग दौर में भाजपा तथा शिवसेना के साथ भी राजनीतिक मुकाबले में रहे हैं. भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि पवार को साधने की कोशिश में उसे एनसीपी के दोनों धड़ों के भीतर के समीकरणों का भी ध्यान रखना होगा. पार्टी के कुछ नेताओं का मानना है कि एनसीपी के वरिष्ठ नेताओं में संगठन में अपनी भूमिका और राजनीतिक भविष्य को लेकर बेचैनी है. 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले वे एक स्थिर नेतृत्व और राजनीतिक ठिकाने की तलाश कर सकते हैं.
लेकिन शरद पवार का अगला कदम क्या होगा, इसका अनुमान लगाना आसान नहीं है. वह कांग्रेस के साथ विपक्षी एकता की संभावनाओं को भी पूरी तरह नजरअंदाज नहीं कर सकते. दूसरी ओर भाजपा के पास सत्ता और संसदीय समर्थन का गणित है.