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जंगल के पत्तों से हर महीने हजारों कमा रहीं महिलाएं! इनके दोना-पत्तल...


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Jamshedpur News: जमशेदपुर के पास बड़ा तालसा गांव की महिलाएं पत्तों से हजारों कमाती हैं. दरअसल ये सुबह जंगल से साल के पत्ते तोड़ती हैं और फिर उनसे दोना-पत्तल बनाकर बाजार में बेचती हैं. इससे उनकी अच्छी आय होती है और पर्यावरण को भी नुकसान नहीं पहुंचता.

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जमशेदपुर. जमशेदपुर से करीब 20 किलोमीटर दूर तिरुलड़ी के बड़ा तालसा गांव की यह कहानी आधुनिकता और परंपरा के बीच एक खूबसूरत संतुलन को दिखाती है. जहां शहरों में शादी-पार्टी या किसी भी कार्यक्रम में प्लास्टिक और थर्माकोल की प्लेटों का इस्तेमाल आम बात हो गई है, वहीं यह गांव आज भी प्रकृति के करीब रहकर अपनी पुरानी परंपराओं को जिंदा रखे हुए है.

सुबह 5 बजे चल देती हैं जंगल की ओर
इस गांव की खासियत है यहां की महिलाएं, जो हर रोज सुबह 5 बजे ही अपने दिन की शुरुआत कर देती हैं. सूरज उगने से पहले ही वे समूह में जंगल की ओर निकल पड़ती हैं और वहां से साल के पत्ते तोड़कर लाती हैं. यह काम सिर्फ रोजमर्रा की जरूरत नहीं, बल्कि उनके जीवन का एक अहम हिस्सा बन चुका है. दिनभर की मेहनत के बाद शाम तक वे इन पत्तों से दोना और पत्तल तैयार कर लेती हैं.

प्लास्टिक, थर्माकोल का नहीं होता इस्तेमाल
गांव की महिला श्रुति हेमरोम बताती हैं कि उनके यहां आज भी किसी भी प्रकार के प्लास्टिक, थर्माकोल या पेपर प्लेट का इस्तेमाल नहीं किया जाता. गांव के लोग पूरी तरह से प्राकृतिक चीजों पर निर्भर हैं. साल के पत्तों और नीम की डंठल से बने दोना-पत्तल न सिर्फ पर्यावरण के लिए सुरक्षित हैं, बल्कि यह गांव की आय का एक मजबूत जरिया भी बन चुके हैं, जिससे लोग लाभ ले रहे हैं.

हर महीने हजारों की कमाई
इन महिलाओं की मेहनत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वे हर महीने हजारों रुपये की कमाई कर लेती हैं. खास बात यह है कि उनके बनाए हुए पत्तल और दोना खरीदने के लिए दूर-दराज के लोग भी गांव तक आते हैं. आसपास के इलाकों में लगने वाले ठेले – जहां समोसा, आलू चाप, वेजिटेबल चप और धुस्का जैसे स्थानीय व्यंजन मिलते हैं -वहां भी इन्हीं पत्तों से बने दोने-पत्तल का इस्तेमाल होता है.

ऐसे जी सकते हैं बेहतर जीवन
यह परंपरा सिर्फ रोजगार का साधन नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण की एक बेहतरीन मिसाल भी है. जहां एक तरफ शहरों में प्लास्टिक का इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है, वहीं बड़ा तालसा गांव यह सिखाता है कि प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर भी बेहतर जीवन वो भी आसानी से जिया जा सकता है.

इस गांव की महिलाएं न सिर्फ आत्मनिर्भर बन रही हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी यह सिखा रही हैं कि अपनी जड़ों से जुड़े रहना कितना जरूरी है. बड़ा तालसा की यह पहल उन सभी के लिए एक प्रेरणा है, जो विकास के नाम पर प्रकृति को भूलते जा रहे हैं.

About the Author

Raina Shukla

बुंदेलखंड यूनिवर्सिटी से मास कम्यूनिकेशन एंड जर्नलिज़्म में मास्टर्स, गोल्ड मेडलिस्ट. पत्रकारिता का सफर दैनिक जागरण से शुरू हुआ, फिर प्रभात खबर और ABP न्यूज़ से होते हुए News18 Hindi तक पहुंचा. करियर और देश की …और पढ़ें



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