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मक्का से तिगुने दाम पर बिकता है मीठा मक्का, 5 कट्ठा से...


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Sweet Corn Farming: करकटा गांव के किसान शंकर महतो ने धान-गेहूं छोड़, स्वीट कॉर्न उगाकर 5 कट्ठा से लगभग 45 हजार शुद्ध मुनाफा कमाया है. वे अगले साल रकबा दोगुना करेंगे. उनका कहना है कि इसकी बाजार में इस कदर मांग रहती है कि हाथों-हाथ बिक्री होती है और सामान्य मक्का की तुलना में कमाई कहीं अधिक होती है.

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पलामू. पलामू जिले के करकटा गांव के किसान शंकर मेहता ने पारंपरिक खेती से हटकर एक नई मिसाल पेश की है. जहां अधिकतर किसान धान और गेहूं की खेती पर निर्भर रहते हैं, वहीं शंकर मेहता ने स्वीट कॉर्न की खेती शुरू कर बेहतर आमदनी का रास्ता खोज लिया है. बता दें कि धान गेहूं की खेती से इसकी खेती ज्यादा फायदा देती है. किसान शंकर मेहता ने लोकल18 को बताया कि धान और गेहूं की तुलना में स्वीट कॉर्न की खेती ज्यादा लाभकारी साबित हो रही है.

अगले साल करेंगे ज्यादा एरिया पर खेती
यही वजह है कि अब वे आने वाले साल में इसकी खेती का रकबा भी बढ़ाने जा रहे हैं. शंकर मेहता ने बताया कि इस वर्ष उन्होंने जानकारी के अभाव में सिर्फ 5 कट्ठा जमीन में स्वीट कॉर्न लगाया था. लेकिन कम जमीन में भी उन्हें अच्छा उत्पादन और बेहतर बाजार भाव मिला. इससे उत्साहित होकर अब अगले साल 10 कट्ठा जमीन में इसकी खेती करने की तैयारी कर रहे हैं.

किसानों को मिलता है अच्छा मूल्य
उन्होंने बताया कि स्वीट कॉर्न सामान्य मक्का से काफी अलग और अधिक फायदेमंद फसल है. जहां साधारण मक्का का दाम 20 से 25 रुपए प्रति किलो मिलता है, वहीं स्वीट कॉर्न बाजार में 60 से 70 रुपए प्रति किलो तक बिकता है. इसकी मांग शहरों, बाजारों और खाने-पीने के स्टॉलों पर लगातार बनी रहती है. यही कारण है कि किसान को इसका अच्छा मूल्य मिल जाता है.

45000 का शुद्ध मुनाफा
शंकर मेहता ने बताया कि स्वीट कॉर्न की यह किस्म लगभग 140 दिनों में तैयार होती है. इसकी एक खासियत यह भी है कि हर पौधे में दो बालियां आती हैं, जिससे उत्पादन अधिक होता है. एक भुट्टे का वजन करीब 400 से 500 ग्राम तक होता है. इससे प्रति पौधा उपज अच्छी मिलती है और कम जमीन में भी अधिक कमाई संभव हो जाती है. इस खेती से उन्हें करीब 45 हजार रुपए शुद्ध मुनाफा हुआ है. खास बात यह रही कि इसमें लागत खर्च लगभग शून्य रहा. क्योंकि आत्मा के द्वारा उन्हें बीज उपलब्ध कराए गए थे.

खेती में उन्होंने पूरी तरह जैविक तरीका अपनाया है. खेत में केवल बर्मी कम्पोस्ट और गोबर आधारित जैविक खाद का उपयोग किया गया. रासायनिक खाद या महंगे कीटनाशकों का प्रयोग नहीं किया गया, जिससे लागत खर्च नहीं के बराबर रहा. साथ ही फसल की गुणवत्ता भी बेहतर मिली.

About the Author

Raina Shukla

बुंदेलखंड यूनिवर्सिटी से मास कम्यूनिकेशन एंड जर्नलिज़्म में मास्टर्स, गोल्ड मेडलिस्ट. पत्रकारिता का सफर दैनिक जागरण से शुरू हुआ, फिर प्रभात खबर और ABP न्यूज़ से होते हुए News18 Hindi तक पहुंचा. करियर और देश की …और पढ़ें



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