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Kerala CM | केरल: सतीशन बोले- सीएम पद से कम कुछ भी...


तिरुवनंतपुरम: केरल चुनाव नतीजों के बाद अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि राज्य का अगला मुख्यमंत्री कौन होगा. केरल में कांग्रेस की शानदार जीत ने हाईकमान के सामने एक मीठी लेकिन जटिल चुनौती खड़ी कर दी है. एक तरफ ज्यादातर विधायक केसी वेणुगोपाल के पक्ष में नजर आ रहे हैं, तो दूसरी तरफ वीडी सतीशन और रमेश चेन्निथला की दावेदारी ने मामले को त्रिकोणीय बना दिया है. दिल्ली से भेजे गए ऑब्जर्वर्स अजय माकन और मुकुल वासनिक ने तिरुवनंतपुरम में नवनिर्वाचित विधायकों से वन-टू-वन बात की है. इस मीटिंग के बाद जो संकेत मिल रहे हैं, उससे साफ है कि मुख्यमंत्री की कुर्सी का फैसला करना मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी के लिए आसान नहीं होगा.

क्या केसी वेणुगोपाल बनेंगे केरल के नए मुख्यमंत्री?

सूत्रों के मुताबिक कांग्रेस के 63 में से ज्यादातर विधायक संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल को मुख्यमंत्री के तौर पर देखना चाहते हैं. वेणुगोपाल को राहुल गांधी का बेहद करीबी माना जाता है और दिल्ली में उनकी पकड़ काफी मजबूत है. विधायकों का मानना है कि वेणुगोपाल के पास संगठन को साथ लेकर चलने का लंबा अनुभव है. हालांकि उनकी राह में सबसे बड़ा रोड़ा यह है कि वे फिलहाल विधायक नहीं हैं बल्कि सांसद हैं.

पार्टी ने चुनाव से पहले यह स्पष्ट किया था कि सांसदों को विधानसभा चुनाव में नहीं उतारा जाएगा. अगर वेणुगोपाल को मुख्यमंत्री बनाया जाता है, तो पार्टी को उनके लिए सुरक्षित सीट ढूंढनी होगी और उपचुनाव कराना होगा. 2004 में के मुरलीधरन के साथ हुआ हादसा पार्टी भूली नहीं है, जब मंत्री बनने के बाद वे उपचुनाव हार गए थे.

केरल की कुर्सी का सस्पेंस: क्या केसी वेणुगोपाल की होगी ताजपोशी या सतीशन मारेंगे बाजी? (Photo : ANI)

वीडी सतीशन की दावेदारी कितनी मजबूत है?

वीडी सतीशन पिछले पांच सालों से केरल विधानसभा में विपक्ष के नेता की भूमिका निभा रहे थे. पिनाराई विजयन सरकार के खिलाफ मोर्चा संभालने में उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी थी. सतीशन को गठबंधन के दूसरे सबसे बड़े दल आईयूएमएल (IUML) का भी साथ मिल रहा है. सतीशन ने सांप्रदायिकता और धार्मिक संगठनों के राजनीति में दखल के खिलाफ कड़ा स्टैंड लिया है, जिससे उनकी छवि एक सुलझे हुए नेता की बनी है.

सतीशन ने हाईकमान को साफ कर दिया है कि वे मुख्यमंत्री पद के अलावा किसी और जिम्मेदारी में दिलचस्पी नहीं रखते. इसे एक तरह के दबाव की राजनीति के तौर पर भी देखा जा रहा है. जनता के बीच भी सतीशन का चेहरा कांग्रेस के मुख्य अभियान का हिस्सा रहा है.

क्या रमेश चेन्निथला की सीनियरिटी को मिलेगी अहमियत?

रमेश चेन्निथला कांग्रेस के सबसे वरिष्ठ नेताओं में से एक हैं. उनके पास प्रशासनिक अनुभव भी ज्यादा है और नायर सर्विस सोसाइटी (NSS) जैसे प्रभावशाली संगठनों के साथ उनके अच्छे संबंध हैं. चेन्निथला ने हाल ही में याद दिलाया कि 2011 में उन्होंने ओमन चांडी के लिए मुख्यमंत्री पद का दावा छोड़ दिया था क्योंकि चांडी सीनियर थे.

अब वे चाहते हैं कि उसी सीनियरिटी को आधार मानकर उन्हें मौका दिया जाए. 2021 में बहुमत के बावजूद उन्हें विपक्ष का नेता नहीं बनाया गया था, जिसकी कसक उनके मन में अब भी है. चेन्निथला के लिए किसी जूनियर नेता जैसे सतीशन या वेणुगोपाल की कैबिनेट में काम करना सम्मान की लड़ाई बन सकता है.

क्या हाईकमान विधायकों की राय को दरकिनार करेगा?

कांग्रेस में यह अक्सर देखा गया है कि हाईकमान विधायकों की राय जानने के बाद अपना फैसला खुद लेता है. 2021 में भी ज्यादातर विधायक चेन्निथला के साथ थे, लेकिन नेतृत्व ने सतीशन को चुना था. इस बार भी पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को यह तय करना है कि वे विधायकों की पसंद को चुनेंगे या फिर प्रशासनिक अनुभव और गठबंधन के तालमेल को प्राथमिकता देंगे.

राहुल गांधी के लिए भी यह फैसला मुश्किल है क्योंकि वेणुगोपाल उनके संकटमोचक रहे हैं. उन्हें दिल्ली से हटाकर केरल भेजना राष्ट्रीय स्तर पर संगठन के लिए एक बड़ा बदलाव होगा. कांग्रेस के सामने चुनौती यह है कि वे जिसे भी चुनें, बाकी दो बड़े नेता नाराज न हों.



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