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ट्राइबल फूड को बनाया कमाई का जरिया, आउटलेट पर लगतीं VVIP गाड़ियां,...


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रांची की अलका और माधुरी ‘द ट्राइबल फूड’ के जरिए पारंपरिक स्वाद परोस रही हैं. इनके आउटलेट पर धुस्का, छिलका रोटी और दुम्बू जैसे व्यंजनों के लिए वीआईपी गाड़ियों की कतार लगती है. शुद्धता और घर के मसालों के दम पर ये बहनें प्रतिदिन ₹6000 तक कमाकर आत्मनिर्भरता की नई मिसाल पेश कर रही हैं.

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रांचीः झारखंड की राजधानी रांची की दो बहनों, अलका और माधुरी ने यह साबित कर दिया है कि अगर आपके पास हुनर है और इरादे मजबूत हैं, तो सफलता कदम चूमती है. इन दोनों बहनों ने किसी आधुनिक फास्ट फूड के बजाय अपने घर के पारंपरिक आदिवासी व्यंजनों को अपना ‘हथियार’ बनाया और आज उनका छोटा सा आउटलेट ‘द ट्राइबल फूड’ शहर के लोगों के लिए शुद्धता और स्वाद का नया पता बन गया है.

पारंपरिक व्यंजनों का जादू
अलका और माधुरी के इस आउटलेट पर झारखंड के पारंपरिक व्यंजन जैसे धुस्का, छिलका रोटी, फुल्का रोटी, चिकन और दुम्बू (एक पारंपरिक मीठा व्यंजन) परोसे जाते हैं. अलका बताती हैं कि उनके यहाँ ‘दुम्बू’ की मांग इतनी अधिक है कि सुबह दुकान खुलने के मात्र 2 घंटे के भीतर ही 100 से ज्यादा पीस बिक जाते हैं। एक दुम्बू की कीमत मात्र 20 रुपये है. इसके अलावा, दोपहर के लंच में चिकन-चावल (100 रुपये प्लेट) की भी भारी डिमांड रहती है, जहाँ रोजाना 25 से 30 प्लेटें आसानी से निकल जाती हैं.

हाइजीन और घर का स्वाद असली पहचान
इस आउटलेट की सफलता के पीछे सबसे बड़ा कारण है सफाई और घर जैसा स्वाद. अलका कहती हैं, “हम बाहर के मसालों का इस्तेमाल बिल्कुल नहीं करते. सभी मसाले घर में तैयार किए जाते हैं और खाना बनाने का तरीका पूरी तरह पारंपरिक है. जब लोग यहाँ चिकन-चावल या छिलका रोटी खाते हैं, तो उन्हें अपनी दादी-नानी के हाथ के स्वाद की याद आ जाती है.”

सटीक लोकेशन का चुनाव भी इनके लिए वरदान साबित हुआ. पास में ही रिनपास (RINPAS) जैसे बड़े अस्पताल और संस्थान होने के कारण यहाँ डॉक्टर, इंजीनियर और मरीज के परिजन नियमित रूप से भोजन करने आते हैं.

आर्थिक आजादी
माधुरी ने अपनी इस यात्रा के बारे में एक बेहद सकारात्मक पहलू साझा किया. वे बताती हैं कि पहले घर में रहने और अधिक आराम करने की वजह से वे कई शारीरिक बीमारियों से घिरी हुई थीं. लेकिन जब से उन्होंने यह काम शुरू किया है, वे दिन में 12-12 घंटे व्यस्त रहती हैं. माधुरी का कहना है कि काम की व्यस्तता ने उनकी सारी बीमारियाँ खत्म कर दी हैं और अब वे मानसिक व शारीरिक रूप से खुद को स्वस्थ महसूस करती हैं.

हर माह 6000  रुपये आमदनी
आज ये दोनों बहनें हर दिन करीब 6,000 रुपये तक की कमाई कर रही हैं. अपनी मेहनत के दम पर वे न केवल आत्मनिर्भर बनी हैं, बल्कि अपने पैरों पर खड़ी होकर समाज के लिए एक मिसाल भी पेश कर रही हैं. वर्तमान में एक छोटे से आउटलेट से शुरुआत करने वाली ये बहनें अब आने वाले समय में रांची के अन्य हिस्सों में भी ‘द ट्राइबल फूड’ की शाखाएं (आउटलेट) खोलने की योजना बना रही हैं.

About the Author

Prashun Singh

मीडिया में 6 साल का अनुभव है. करियर की शुरुआत ETV Bharat (बिहार) से बतौर कंटेंट एडिटर की थी, जहां 3 साल तक काम किया. पिछले 3 सालों से Network 18 के साथ हूं. यहां बिहार और झारखंड से जुड़ी खबरें पब्लिश करता हूं.



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