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Success Story: झारखंड की राजधानी रांची से 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित गुंडू गांव की लैला देवी खासतौर पर बत्तख पालने का काम करती हैं. उनका पूरा जीवन यापन इसी पर निर्भर है. उनके घर में कोई नहीं है. वह गर में सिर्फ अकेली हैं. एक बत्तख ₹400 केजी तक होती है. जहां एक की कीमत ₹800 तक चली जाती है. उन्होंने बताया कि उन्हें खासतौर पर देसी चारा खिलाना पड़ता है. आइये जानते हैं लैला देवी के बारे में.
लैला बताती हैं कि गुड और चावल का बत्तख के लिए खास चारा बनाया जाता है. इससे बीमारी नहीं होती है और लंबे समय तक तंदुरुस्त रहते हैं. दोपहर में जैसे हमारे खाने के लिए चावल बनता है. बस वही चावल को ले लेते हैं. उसमें थोड़ा गुड और थोड़ा भूसा मिलाते हैं.
इन दोनों को मिलाकर छोटा-छोटा चारा बनाती हैं और इन सभी को देते हैं. उनके पास कम से कम 60 से 70 बत्तख थी. बीते चार-पांच दिनों में बेचने के बाद फिलहाल 20 ही बची हुई हैं. हालांकि अभी उनके पास 40- 50 बच्चे हैं. वह भी 10-20 दिन में अच्छे खासे मोटे हो जाएंगे.
देसी तरीके से बड़ा और तंदुरुस्त करने के लिए इस तरीके का दाना तो देते हैं. जैसे ज्वार और जो भुट्टा तीनो को मिला के दाना तैयार किया जाता है. जो काफी फायदेमंद रहता है. इससे उनका शरीर काफी फिट रहता है. चावल, गेहूं व हरी सब्जी का मिश्रण भी इनको दिया जाता है.
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इसके अलावा उनके लिए साफ पानी का इंतजाम किया जाता है. दिन में कम से कम 4 से 5 बार हम लोग इनको विशेष चारा देते हैं, जो हम लोग पानी पीते हैं. वहीं, साफ पानी इन्हें भी दिया जाता है और साफ सफाई कभी विशेष ध्यान रखा जाता है. इनके लिए एक छोटी सी लकड़ी का घर बना होता है.
जिसको अपने घर की तरह हर दिन साफ करती हैं. क्योंकि पशुओं में गंदगी की वजह से ही बीमारी आती है, तो ऐसे में अगर आप साफ-सफाई रखेंगे तो बीमारी होने की संभावना काफी कम हो जाएगी. उन्होंने बताया कि एक का ₹400 केजी तक दाम होती है. ऐसे में अगर कोई डेढ़ केजी या 2 केजी तक है तो आराम से ₹800 तक भी मिल जाता है.
अगर हम एक बार में चार से पांच बेच लें तो हमारी अच्छी खासी बचत हो जाती है. जीवन यापन के लिए यह हमारे लिए वरदान से कम नहीं है. महीना में हम जब ऐसे 50 बत्तख तक बेचती हैं तो घर का राशन, पानी, खुद के लिए दवा हर एक चीज यहां से निकल जाती है.