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एक्सपर्ट ने आगे बताया कि पलाश का पेड़ केवल सुंदरता के लिए नहीं बल्कि कई उपयोगों के लिए भी प्रसिद्ध रहा है. इसके फूलों से प्राकृतिक रंग तैयार किया जाता था, जिसका उपयोग खासकर होली में होता था. वहीं इसके बीजों से स्ट्राजीन साइट्रेट जैसे तत्व प्राप्त होते हैं, जिनसे कीटनाशक दवाएं बनाई जाती हैं. पेड़ से निकलने वाले लासा का भी ग्रामीण व्यापार करते थे.
मेदिनीनगर: झारखंड के मेदिनीनगर से लगभग 15 किलोमीटर दूर लेस्लीगंज के पास स्थित कुंदरी लाह बगान आज भी पलामू की प्राकृतिक और आर्थिक पहचान बना हुआ है. एशिया के सबसे बड़े लाह बागानों में गिने जाने वाले इस क्षेत्र में करीब 421 से 581 एकड़ भूमि पर लगभग 90 हजार से लेकर तीन लाख तक पलाश के पेड़ फैले हुए हैं. वसंत ऋतु आते ही जब पलाश के पत्ते झड़ जाते हैं, तब पूरा इलाका लाल और नारंगी फूलों से ढक जाता है. दूर से देखने पर ऐसा लगता है मानो पूरा जंगल आग की लपटों में जल रहा हो. इसी वजह से पलाश को “फ्लेम ऑफ द फॉरेस्ट” भी कहा जाता है.
केवाल मिट्टी का इंडिकेटर है पलाश
वन विशेषज्ञ डॉ० डी एस श्रीवास्तव ने लोकल18 को बताया कि हर पौधा हर प्रकार की मिट्टी में नहीं उग सकता. पलाश का पेड़ खास तौर पर केवाल मिट्टी में ही अच्छी तरह विकसित होता है. केवाल मिट्टी की सबसे बड़ी विशेषता है कि गर्मी में यह फट जाती है. मिट्टी के फटने पर पलाश के पतले बीज अंदर तक चले जाते हैं और अंकुरित होकर तीन से चार फीट गहराई तक जड़ जमा लेते हैं. यही कारण है कि जहां केवाल मिट्टी होती है, वहां पलाश के वृक्ष आसानी से दिखाई देते हैं. पलाश को इसी वजह से मिट्टी का इंडिकेटर भी माना जाता है.
कभी हजारों लोगों की आजीविका का था सहारा
उन्होंने आगे कहा कि कुंदरी लाह बगान को वन विभाग ने लाह पालन के बड़े केंद्र के रूप में विकसित किया था. एक समय ऐसा था जब पलाश के इन पेड़ों से हजारों ग्रामीणों को रोजगार मिलता था. पलाश पर प्राकृतिक लाह उत्पादन कर गांव के लोग अच्छी कमाई करते थे. यह क्षेत्र एशिया के दूसरे सबसे बड़े लाह उत्पादन केंद्रों में भी गिना जाता था. हालांकि, समय के साथ यह परंपरा कमजोर पड़ गई, लेकिन आज भी यहां लाह उत्पादन की अपार संभावनाएं मौजूद हैं.
रंग, दवा और व्यापार का आधार
एक्सपर्ट ने आगे बताया कि पलाश का पेड़ केवल सुंदरता के लिए नहीं बल्कि कई उपयोगों के लिए भी प्रसिद्ध रहा है. इसके फूलों से प्राकृतिक रंग तैयार किया जाता था, जिसका उपयोग खासकर होली में होता था. वहीं इसके बीजों से स्ट्राजीन साइट्रेट जैसे तत्व प्राप्त होते हैं, जिनसे कीटनाशक दवाएं बनाई जाती हैं. पेड़ से निकलने वाले लासा का भी ग्रामीण व्यापार करते थे.
पलामू की धरोहर बना कुंदरी लाह बगान
उन्होंने कहा कि आज भले ही आधुनिकता के दौर में लाह पालन कम हो गया हो, लेकिन कुंदरी लाह बगान पलामू की ऐतिहासिक और आर्थिक विरासत के रूप में आज भी खड़ा है. प्राकृतिक सौंदर्य, मिट्टी की पहचान और रोजगार की पुरानी कहानी समेटे यह स्थान आने वाली पीढ़ियों के लिए किसी धरोहर से कम नही है. इसके साथ ये पर्यटन के लिहाज से भी काफी बेहतर है.
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