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Kundri Lah Bagan Palamu: झारखंड के पलामू जिले का ‘कुंदरी लाह बगान’ केवल एक बगान नहीं, बल्कि हमारी ऐतिहासिक, आर्थिक और प्राकृतिक विरासत का प्रतीक है. एक समय था जब यह पूरे एशिया के प्रमुख लाह उत्पादन केंद्रों में गिना जाता था. आज यह बगान पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित तो कर रहा है, लेकिन अगर इसकी विरासत को सही ढंग से संरक्षित किया जाए, तो यह स्थानीय युवाओं और आदिवासियों के लिए रोजगार का एक बहुत बड़ा जरिया बन सकता है. प्रशासन को इस दिशा में ठोस कदम उठाने की जरूरत है.
झारखंड की राजधानी रांची से करीब 165 किलोमीटर दूर स्थित पलामू जिला अपनी ऐतिहासिक विरासत, प्राकृतिक संपदा और सांस्कृतिक पहचान के लिए जाना जाता है. इसी जिले में स्थित है कुंदरी लाह बगान, जो कभी एशिया के सबसे प्रसिद्ध लाह उत्पादन केंद्रों में शुमार था. आज भी यह बगान अपनी प्राकृतिक सुंदरता और गौरवशाली इतिहास के कारण लोगों को आकर्षित करता है. मेदिनीनगर से लगभग 15 किलोमीटर दूर लेस्लीगंज के पास फैला यह क्षेत्र पलामू की पहचान बन चुका है.
वसंत और होली के मौसम में कुंदरी लाह बगान का दृश्य पूरी तरह बदल जाता है. पलाश के पेड़ों से पत्ते झड़ने लगते हैं और उनकी जगह लाल व नारंगी रंग के फूल खिल उठते हैं. चारों ओर फैले इन फूलों को देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो पूरा जंगल आग की लपटों में जल रहा हो. यही वजह है कि पलाश को दुनिया भर में “फ्लेम ऑफ द फॉरेस्ट” के नाम से जाना जाता है. इस मौसम में यहां का नजारा पर्यटकों को खास तौर पर आकर्षित करता है.
कुंदरी लाह बगान करीब 421 से 581 एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है. विभिन्न आकलनों के अनुसार यहां 90 हजार से लेकर तीन लाख तक पलाश के पेड़ मौजूद हैं. इतने बड़े पैमाने पर पलाश के वृक्षों का समूह इसे देश और एशिया के महत्वपूर्ण लाह क्षेत्रों में स्थान दिलाता है. दूर-दूर तक फैले लाल फूलों से सजे ये वृक्ष प्राकृतिक सौंदर्य का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करते हैं.
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वन विशेषज्ञ डॉ. डी.एस. श्रीवास्तव बताते हैं कि पलाश का पेड़ केवल विशेष प्रकार की मिट्टी में ही अच्छी तरह विकसित होता है. यह मुख्य रूप से केवाल मिट्टी में उगता है, जिसकी विशेषता है कि गर्मी के मौसम में इसमें दरारें पड़ जाती हैं. इन्हीं दरारों के भीतर पलाश के पतले बीज चले जाते हैं और अंकुरित होकर गहराई तक जड़ें जमा लेते हैं. यही कारण है कि पलाश को केवाल मिट्टी का प्राकृतिक संकेतक या इंडिकेटर माना जाता है.
एक समय ऐसा था जब कुंदरी लाह बगान हजारों ग्रामीण परिवारों की आजीविका का मुख्य आधार हुआ करता था. वन विभाग ने इस क्षेत्र को लाह उत्पादन के बड़े केंद्र के रूप में विकसित किया था. पलाश के पेड़ों पर प्राकृतिक रूप से लाह का उत्पादन होता था और ग्रामीण इसे एकत्र कर बाजार में बेचते थे. इससे उन्हें अच्छी आय प्राप्त होती थी और पूरे क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलती थी.
पलाश का पेड़ केवल लाह उत्पादन तक सीमित नहीं है. इसके फूलों से प्राकृतिक रंग तैयार किया जाता रहा है, जिसका उपयोग विशेष रूप से होली के अवसर पर किया जाता था. वहीं इसके बीजों से प्राप्त तत्वों का उपयोग कीटनाशक दवाओं के निर्माण में भी होता है. पेड़ से निकलने वाला लासा भी ग्रामीणों के लिए आय का एक महत्वपूर्ण स्रोत रहा है. इस प्रकार पलाश का आर्थिक और औषधीय महत्व दोनों ही बेहद खास हैं.
आज भले ही लाह पालन पहले की तुलना में कम हो गया हो, लेकिन कुंदरी लाह बगान पर्यटन के क्षेत्र में नई संभावनाएं पैदा कर रहा है. शाम के समय पलाश के लाखों फूलों के बीच घूमना किसी प्राकृतिक चित्रशाला में प्रवेश करने जैसा अनुभव देता है. फोटोग्राफी, प्रकृति प्रेम और शांत वातावरण की तलाश में आने वाले लोगों के लिए यह स्थान किसी स्वर्ग से कम नहीं है.
कुंदरी लाह बगान केवल एक वन क्षेत्र नहीं बल्कि पलामू की ऐतिहासिक, आर्थिक और प्राकृतिक धरोहर है. यह बगान उस दौर की याद दिलाता है जब लाह उत्पादन यहां की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ हुआ करता था. आज जरूरत है कि इस विरासत को संरक्षित किया जाए और लाह पालन को फिर से बढ़ावा देकर स्थानीय लोगों को रोजगार के नए अवसर उपलब्ध कराए जाएं. प्राकृतिक सौंदर्य और समृद्ध इतिहास को समेटे यह बगान आने वाली पीढ़ियों के लिए एक अमूल्य धरोहर बना रहेगा.