देवघर. वैसे तो देवघर को देवों की नगरी के रूप में जाना जाता है, लेकिन यह शहर सिर्फ धार्मिक आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि इतिहास की कई अनकही कहानियों को भी अपने भीतर समेटे हुए है. देवघर और उसके आसपास आज भी कई ऐसी इमारतें मौजूद हैं, जो ब्रिटिश शासन की याद दिलाती हैं. इन्हीं ऐतिहासिक धरोहरों में शामिल है कोयरिडीह का पुराना डाकबंगला.
शांत वातावरण, विशाल परिसर और अंग्रेजों के जमाने की इमारत बनाने की शैली वाला यह डाकबंगला, आज भी लोगों के बीच आकर्षण का केंद्र बना हुआ है. समय के साथ इसके उपयोग और स्वरूप में बदलाव जरूर आया है, लेकिन इसकी दीवारें अब भी उस दौर की गवाही देती हैं, जब अंग्रेजी शासन ग्रामीण इलाकों तक अपनी प्रशासनिक पकड़ मजबूत करने में जुटा हुआ था.
क्या कहते हैं युवा इतिहासकार
युवा इतिहासकार शुभम राय बताते हैं कि कोयरिडीह और रोहिणी का इलाका ऐतिहासिक रूप से काफी महत्वपूर्ण रहा है. ब्रिटिश शासन के दौरान संथाल परगना बंगाल प्रेसीडेंसी का हिस्सा हुआ करता था. उस समय अंग्रेज प्रशासन धार्मिक और राजस्व व्यवस्था पर अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय था.
बाबा बैद्यनाथ धाम आने वाले श्रद्धालुओं, व्यापारिक गतिविधियों और राजस्व व्यवस्था पर निगरानी रखने के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्रों में प्रशासनिक नियंत्रण स्थापित करना भी उनकी प्राथमिकताओं में शामिल था.
अधिकारी ठहरते थे यहां
इसी क्रम में कोयरिडीह क्षेत्र अंग्रेजों की नजर में आया. प्राकृतिक रूप से समृद्ध, रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण और मुख्य मार्गों से जुड़ा होने के कारण यह इलाका उनके लिए उपयुक्त साबित हुआ. माना जाता है कि इसी उद्देश्य से यहां लगभग 1875 ईस्वी में एक डाकबंगले का निर्माण किया गया, जहां अधिकारी ठहरते थे और प्रशासनिक गतिविधियों का संचालन किया जाता था.
ब्रिटिश प्रशासन का बैठक स्थल हुआ करता था
स्थानीय इतिहास से जुड़े कई संदर्भ बताते हैं कि इस डाकबंगले का उपयोग अधिकारियों की बैठकों, निरीक्षण यात्राओं और प्रशासनिक कार्यों के लिए किया जाता था. ग्रामीण क्षेत्रों से जुड़े कई मामलों पर चर्चा यहीं होती थी. उस दौर में डाकबंगले केवल विश्रामगृह नहीं, बल्कि स्थानीय प्रशासन के अस्थायी केंद्र भी हुआ करते थे.
यही कारण है कि कोयरिडीह का यह डाकबंगला लंबे समय तक क्षेत्रीय प्रशासनिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण हिस्सा बना रहा. आज भले ही यहां वैसी चहल-पहल नहीं दिखती, लेकिन इसके पुराने कमरे, बरामदे और संरचना उस इतिहास की झलक आज भी पेश करते हैं.
डाकबंगले से जुड़ी हैं कई रोचक कथाएं
इस डाकबंगले से जुड़ी एक और रोचक चर्चा स्थानीय लोगों और इतिहास प्रेमियों के बीच सुनने को मिलती है. डाकबंगले के सामने स्थित दिघरिया पहाड़ का संबंध स्वतंत्रता आंदोलन की कुछ चर्चित कथाओं से मिलता है. स्थानीय लोगों के अनुसार, क्रांतिकारी गतिविधियों के दौरान यह इलाका स्वतंत्रता सेनानियों के संपर्क में रहा था.
इतिहासकारों का कहना है कि उस समय संथाल परगना और आसपास के क्षेत्रों में ब्रिटिश शासन के खिलाफ असंतोष का माहौल था और कई क्रांतिकारी संगठन गुप्त रूप से सक्रिय थे. ऐसे में कोयरिडीह और रोहिणी क्षेत्र का महत्व और बढ़ जाता है.
आसपास का प्राकृतिक सौंदर्य अंग्रेजों को खूब भाया था
अंग्रेजों को यह इलाका केवल प्रशासनिक कारणों से ही नहीं, बल्कि इसके प्राकृतिक सौंदर्य के कारण भी पसंद था. डाकबंगले के सामने फैला दिघरिया पहाड़, आसपास की हरियाली, स्वच्छ वातावरण और अपेक्षाकृत शांत परिवेश इसे विशेष बनाता था. यही वजह थी कि यह स्थान अधिकारियों के विश्राम और बैठकों के लिए उपयुक्त माना गया.
समय के साथ यह क्षेत्र पर्यटन और फिल्म जगत की नजर में भी आया. स्थानीय लोगों के अनुसार, देश आजाद होने के बाद भी इस परिसर का महत्व बना रहा और यहां फिल्म जगत से जुड़े लोगों का भी आना-जाना हुआ. 1984 में यहां ‘पार’ नामक हिंदी फिल्म की शूटिंग भी की गई थी, जिसमें नसरुद्दीन शाह, ओम पुरी, शबाना आजमी सहित कई कलाकारों ने काम किया था.
2013 में इस इमारत का कराया गया था जीर्णोद्धार
वर्तमान समय में यह ऐतिहासिक भवन वन विभाग के विश्राम स्थल के रूप में उपयोग में लाया जा रहा है. वर्षों पुरानी इस इमारत का जीर्णोद्धार भी कराया गया, ताकि इसकी मूल पहचान को सुरक्षित रखा जा सके. भवन के भीतर आज भी कई ऐसे हिस्से मौजूद हैं, जो अंग्रेजों के समय की याद दिलाते हैं.
पुराने कमरों की बनावट, दरवाजों की शैली, ड्रेसिंग टेबल, अलमारी और अन्य संरचनात्मक विशेषताएं उस समय की स्थापत्य कला की झलक दिखाती हैं. लगभग 10 से 12 एकड़ में फैला यह परिसर इतिहास, प्रकृति और विरासत का अनोखा संगम प्रस्तुत करता है.
देवघर का डाकबंगला कोयरिडीह धरोहर में है मौजूद
कोयरिडीह का डाकबंगला केवल एक पुरानी इमारत नहीं है, बल्कि यह देवघर के उस इतिहास का हिस्सा है, जिसे बहुत कम लोग जानते हैं. यह भवन ब्रिटिश शासन, प्रशासनिक गतिविधियों, स्थानीय इतिहास और बदलते समय का साक्षी रहा है.
आज भी जब कोई इस परिसर में पहुंचता है, तो उसे सिर्फ एक भवन नहीं, बल्कि इतिहास के कई अध्याय एक साथ दिखाई देते हैं. यही वजह है कि कोयरिडीह डाकबंगला देवघर की उन धरोहरों में शामिल है, जो आने वाली पीढ़ियों को अतीत से जोड़ने का काम करती हैं.