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अखंड सौभाग्य और सुख-समृद्धि की कामना के साथ आज वट सावित्री पूजा...




खुशबू सिंह|रांची अखंड सौभाग्य और सुख-समृद्धि की कामना के साथ सुहागिनें शनिवार को वट सावित्री पूजा करेंगी। वट वृक्षों के नीचे सुहागिन महिलाएं श्रद्धा और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ पूजा-अर्चना कर अपने पति की लंबी आयु की कामना करेंगी। ज्योतिष शालिनी वैद्य ने बताया कि ज्येष्ठ मास की अमावस्या पर वट सावित्री पूजा पड़ती है। अमावस्या शुक्रवार की संध्या 03:51 बजे से शुरू होकर शनिवार दोपहर 1:36 बजे तक है। इससे वट सावित्री व्रत का मान दिनभर होगा। पूजा के लिए सूर्योदयकालीन मुहूर्त सबसे उत्तम है। चंद्रमा के वृषभ राशि में रहने से यह व्रत शुभसंयोग लेकर आएगा। भरणी नक्षत्र व कृत्तिका नक्षत्र और सौभाग्य व शोभन योग भी रहेगा। विधिवत पूजा-अर्चना कराने के बाद सत्यवान-सावित्री और यमराज की पौराणिक कथा सुननी चाहिए। मान्यता है कि माता सावित्री ने अपने तप, निष्ठा और प्रेम के बल पर यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस प्राप्त किए थे। तभी से यह व्रत अखंड सुहाग और दांपत्य सुख का प्रतीक माना जाता है। पूजा के दौरान महिलाएं वट वृक्ष की परिक्रमा करते हुए उसके तने में कच्चा सूत बांधेंगी और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करेंगी। पूजन के बाद महिलाएं एक-दूसरे की मांग में सिंदूर लगाकर अमर सुहाग का आशीर्वाद देंगी। इधर, बाजारों में पूजा को लेकर विशेष चहल-पहल रही। महिलाएं पारंपरिक लोकगीत गाते हुए पूजा की तैयारियों में जुटी रहीं। वट सावित्री व्रत में वट वृक्ष के साथ-साथ सत्यवान-सावित्री और यमराज की पूजा की जाती है। माना जाता है कि वटवृक्ष में भगवान ब्रह्मा, भगवान विष्णु और महेश तीनों देव वास करते हैं। वट सावित्री व्रत के दिन सुहागिन स्त्रियों को प्रातःकाल उठकर स्नान करना चाहिए। इसके बाद सत्यवान और सावित्री की पूजा करें और वट वृक्ष को जल देकर फूल, रोली-मौली, कच्चा सूत, भीगा चना, गुड़ इत्यादि चढ़ाएं और जलाभिषेक करें। इसके बाद वटवृक्ष के तने के चारों ओर कच्चा धागा लपेटकर तीन बार या यथा शक्ति 5, 11, 21, 51 या 108 बार परिक्रमा करें। वट वृक्ष के पते को बाल में लगाकर सावित्री सत्यवान की कथा सुनें। फिर बांस के पंखे से सत्यवान-सावित्री को हवा करें।



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