अमेठी: हमारे देश में कई स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आज भी प्रेरणा का स्वरूप माने जाते हैं. उनकी चर्चा होती है तो लोग गर्व से कहते हैं कि हम उनके परिवार से हैं. ऐसी ही कहानी एक ऐसे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की है, जिनकी गैरमौजूदगी के बाद भी लोग आज उन्हें प्रेरणा पुरुष बताते हैं. स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ऐसे थे कि उन्होंने कष्ट, दुख, तकलीफ और विभिन्न यातनाओं को सहकर भी परिवार नहीं, देश की जिम्मेदारी के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए. आज भी उनके परिवार के लोग मौजूद हैं और उनकी बात और कहानी बताते-बताते न सिर्फ भावुक होते हैं, बल्कि उनके ऊपर गर्व महसूस करते हैं कि वह उनके परिवार के सदस्य हैं.
कम उम्र में ही देश के लिए खुद को किया समर्पित
कहानी है अमेठी जिले के गौरीगंज तहसील के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रामनाथ सिंह की. अमेठी जिले के यह बहादुर बेटे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रामनाथ सिंह अमेठी के गौरीगंज तहसील क्षेत्र के रोहसी बुजुर्ग गांव के रहने वाले हैं. रामनाथ सिंह ने कम उम्र में ही अपने परिवार को छोड़ दिया और देश हित में अपने आप को समर्पित कर दिया. अंग्रेजों की फौज जाती, उनके परिवार को डराती और उन्हें परेशान करती, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी.
1932 में जब वह पहली बार जेल गए तो परिवार के लोगों ने उन्हें बार-बार समझाने की कोशिश की कि वह इस काम को छोड़ दें और अन्य कामों पर ध्यान दें. परिवार की एक न सुनी और देश की आजादी के मतवाले हो गए. जहां-जहां वे जाकर लोगों को जागरूक करते, अंग्रेजी हुकूमत की सेना उन परिवारों को भी परेशान करती और उनके साथ दुर्व्यवहार करती, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी. आज उनकी गैरमौजूदगी के बाद भी परिवार गर्व करता है कि वह उनके परिवार से थे.
अंग्रेजों की यातनाएं भी नहीं तोड़ पाईं हौसला
लोकल 18 से बातचीत करते हुए उनके परिवार के पौत्र स्वतंत्रता संग्राम सेनानी सत्यदेव सिंह और गब्बर सिंह बताते हैं कि उनके बाबा रामनाथ सिंह एक महान क्रांतिकारी थे. परिवार वालों ने बताते हुए कहा कि उन्होंने देश हित में अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया. कभी सरकार के सामने झुके नहीं. अंग्रेजी हुकूमत ने उन्हें मारा, परेशान किया, जेल में बंद कराया और तरह-तरह की प्रताड़ना दी, लेकिन उन्होंने देश की आजादी के प्रति अपने परिवार को भी पीछे छोड़ दिया.
परिवार के सत्यदेव सिंह बताते हैं कि यातनाओं के दौरान ही उनकी आंख चली गई. डॉक्टर ने उन्हें घर से बाहर जाने के लिए मना किया, लेकिन उन्होंने अपनी जिद के आगे अपनी दोनों आंखों की रोशनी भी खो दी, लेकिन कभी हार नहीं मानी.
1972 में मिला ताम्र पत्र आज भी मौजूद
उस समय की तत्कालीन प्रधानमंत्री स्वर्गीय इंदिरा गांधी ने उनकी बहादुरी की चर्चा करते हुए उन्हें 1972 में 25वें स्वतंत्रता दिवस पर ताम्र पत्र दिया था. अपने आप में उनकी बहादुरी की चर्चा काफी प्रेरणादायक है. परिवार के सदस्य गब्बर सिंह बताते हैं कि उनकी कहानी इतनी प्रेरणादायक है कि आज भी लोग अगर उस समय की तरह देश हित में काम करें तो देश तरक्की करे और आगे बढ़े.
गांव वालों से मांगते थे एक-एक रोटी
जब बार-बार अंग्रेजी हुकूमत उन्हें परेशान करने लगी और उनके साथ गांव वालों को भी परेशान कर सताने लगी तो उन्होंने नया तरीका अपनाया. वह हर घर से एक रोटी मांगकर ले जाते थे और गांव के बीचो-बीच चबूतरे पर बैठकर आसानी से खाते थे. वहीं पर लोगों को देशभक्त बनने और देश हित में काम करने के लिए जागरूक करते थे.
आज भी यादों में जिंदा है स्वतंत्रता सेनानी
उनकी याद में आज भी गेट बना है, लेकिन परिवार के लोगों का कहना है कि सरकार की तरफ से वह गेट उनके मुख्य द्वार पर होना चाहिए, जबकि ऐसा नहीं है. परिवार चाहता है कि उनके पूर्वज की स्मृति और योगदान को उचित सम्मान मिले, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी उनके बलिदान और देशभक्ति से प्रेरणा ले सकें.