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कम बारिश के बीच अरहर की खेती किसानों के लिए मुनाफे का सौदा साबित हो सकती है. कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार सही किस्मों का चयन और बुआई से पहले बीज उपचार करना बेहद जरूरी है. इससे फसल को बीमारियों से बचाया जा सकता है और पैदावार बढ़ाई जा सकती है.
पलामूः झारखंड में इस बार सामान्य से कम वर्षा हुई है. वहीं कम वर्षा और बदलते मौसम के बीच पलामू के किसानों के लिए अरहर की खेती बेहतर विकल्प बनकर उभर रही है. ऐसे में यदि किसान वैज्ञानिक तरीके से खेती करें और शुरुआत से ही बीज उपचार व फसल प्रबंधन पर ध्यान दें, तो इस क्षेत्र में अरहर की अच्छी पैदावार प्राप्त की जा सकती है. क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र, चियांकी में वर्तमान में 10 एकड़ क्षेत्र में अरहर की खेती की जा रही है, जहां विभिन्न किस्मों और तकनीकों का प्रदर्शन किया जा रहा है.
पलामू के लिए उपयुक्त किस्में
क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र के कृषि वैज्ञानिक डॉ प्रमोद कुमार ने लोकल18 को बताया कि पलामू की जलवायु और मिट्टी के लिए आईपीएल-02 (IPL-02) तथा राजेंद्र अरहर-2 किस्म सबसे उपयुक्त है. जिससे अच्छा उत्पादन होने की संभावना है. ये किस्में स्थानीय परिस्थितियों में बेहतर उत्पादन देने में सक्षम हैं. केंद्र में इन किस्मों के बीज उपलब्ध हैं, जिन्हें किसान खरीदकर खेती शुरू कर सकते हैं.
बीज उपचार और बुआई है सबसे महत्वपूर्ण
उन्होंने कहा कि अरहर की खेती में बीज उपचार करना बेहद जरूरी है. किसान बुआई से पहले बीज को कार्बेंडाजिम या मैनकोजेब से उपचारित करें. इससे उकठा समेत कई फफूंदजनित रोगों का खतरा काफी हद तक कम हो जाता है. अरहर की बुआई के लिए 8 किलोग्राम बीज प्रति एकड़ पर्याप्त माना गया है, जिससे पौधों की उचित संख्या बनी रहती है और बेहतर उत्पादन मिलता है.
जल निकासी और पोषण प्रबंधन पर दें ध्यान
आगे कहा कि यदि किसान मध्यम भूमि में अरहर की खेती कर रहे हैं, तो खेत में मेढ़ बनाकर बुआई करें और जल निकासी की समुचित व्यवस्था रखें. जलभराव होने पर फसल प्रभावित हो सकती है. उर्वरक प्रबंधन के तहत प्रति हेक्टेयर 25:50:25:20 के अनुपात में पोषक तत्व देने की सलाह दी गई है. वहीं स्थानीय स्तर पर प्रति कट्ठा लगभग 1 किलोग्राम डीएपी और 3 किलोग्राम पोटाश का उपयोग लाभदायक है.
फली छेदक कीट से ऐसे करें बचाव
आगे कहा कि अरहर में फली बनने के दौरान फली छेदक कीट का प्रकोप देखने को मिलता है. इससे बचाव के लिए इंडोक्साकार्ब 14.5 एससी का 1.5 मिली प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करने की सलाह दी है. समय पर नियंत्रण करने से फसल को नुकसान से बचाया जा सकता है और उत्पादन में बढ़ोतरी होती है.
किसानों के लिए बेहतर अवसर
उन्होंने कहा कि अरहर लगभग 7 से 8 महीने में तैयार होने वाली फसल है और पलामू की वर्तमान जलवायु में इसकी खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है. किसानों को किसी तरह की आशंका रखने की जरूरत नहीं है. यदि वैज्ञानिक सलाह के अनुसार बीज उपचार, संतुलित उर्वरक, जल निकासी और कीट प्रबंधन अपनाया जाए, तो पलामू में अरहर की खेती किसानों की आय बढ़ाने का मजबूत माध्यम बन सकती है.
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प्रसून सिंह को मीडिया में 7 साल काम करने का अनुभव है. खबरों को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर रोचक अंजाद में पेश करना खासियत है. दैनिक भास्कर अखबार में इंटर्नशिप के साथ करियर की शुरुआत हुई.
इसके बाद ETV Bharat (बिहार)…
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