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अष्‍टलक्ष्‍मी का आशीर्वाद ! धरती के नीचे छ‍िपा ‘खजाना’ न‍िकालने जा रही...


भारत पर अष्‍टलक्ष्‍मी की कृपा बरसने जा रही है. अब न तेल का संकट होगा, न गैस का. क्‍योंक‍ि सरकार धरती के नीचे छ‍िपा ‘खजाना’ न‍िकालने जा रही है. गुरुवार को गृहमंत्री अमित शाह ने खुद इसका ऐलान क‍िया. असम और नगालैंड के मुख्‍यमंत्र‍ियों को बिठाकर शाह ने एक डील पर मुहर लगवाई, जिससे असम-नागालैंड सीमा क्षेत्र में मौजूद तेल, गैस और दुर्लभ खनिजों को न‍िकालने और उसके इस्‍तेमाल करने का रास्‍ता साफ हो गया है. शाह ने कहा क‍ि दशकों से इन राज्‍यों के बीच सीमा व‍िवाद था, जिससे हम राष्‍ट्रीय संपदा का इस्‍तेमाल नहीं कर पा रहे थे, अब यह संकट दूर कर ल‍िया गया है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पूर्वोत्‍तर के राज्‍यों को अष्‍टलक्ष्‍मी कहते रहे हैं. वे बार-बार कहते रहे हैं क‍ि ये भारत की तरक्‍की का प्रवेश द्वार हैं. अब यहीं पर भारत को वो खजाना म‍िला है. दरअसल, असम और नागालैंड की सीमा से लगे कुछ तेल क्षेत्रों को लेकर लंबे समय से विवाद चला आ रहा था. इसी वजह से इन इलाकों में बड़े पैमाने पर तेल और गैस की खोज तथा उत्पादन नहीं हो पा रहा था. नई व्यवस्था के तहत दोनों राज्य संसाधनों से होने वाले लाभ को 50-50 के आधार पर साझा करेंगे. सरकार का मानना है कि इससे न सिर्फ पुराने विवाद कम होंगे बल्कि ऊर्जा क्षेत्र में निवेश भी बढ़ेगा. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अब 1,000 वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र में तेल और गैस की खोज और उत्पादन का रास्ता खुल गया है.

होर्मुज संकट के बीच क्यों अहम है यह फैसला?

भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता देश है. लेकिन अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है. इसमें बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आता है. लेकिन ईरान ने स्‍ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद कर रखा है, जिससे तेल और गैस का संकट हो रहा है. एनर्जी एक्‍सपर्ट लंबे समय से कहते रहे हैं कि भारत को घरेलू उत्पादन बढ़ाने पर जोर देना चाहिए ताकि विदेशी निर्भरता कम हो सके. असम-नागालैंड समझौता इसी दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है.

धरती के नीचे कितना बड़ा खजाना?

गृह मंत्री अमित शाह के मुताबिक पूरे पूर्वोत्तर क्षेत्र में तेल, प्राकृतिक गैस और कई प्रकार के खनिजों का विशाल भंडार मौजूद है. लेकिन कानून-व्यवस्था की समस्याओं, सीमा विवादों और प्रशासनिक अड़चनों के कारण इनका पूरा उपयोग नहीं हो पाया. शाह ने दावा किया कि अभी जिन क्षेत्रों से प्रतिदिन लगभग 1,000 से 1,500 बैरल उत्पादन हो रहा है, वहां क्षमता को 10 गुना से भी अधिक बढ़ाया जा सकता है. उन्होंने यह भी कहा कि केवल एक तेल क्षेत्र से ही 15,000 करोड़ रुपये से ज्यादा मूल्य का उत्पादन संभव है. यदि नागालैंड और आसपास के इलाकों में मौजूद तेल-गैस भंडार का पूरी तरह दोहन किया जाता है तो भारत की आयात निर्भरता कम करने में बड़ी मदद मिल सकती है.

पूर्वोत्तर के लिए क्या बदलेगा?

इस समझौते का असर केवल तेल और गैस तक सीमित नहीं है. केंद्र सरकार का मानना है कि यह मॉडल भविष्य में खनन क्षेत्र के लिए भी रास्ता खोल सकता है. पूर्वोत्तर भारत में कोयला, चूना पत्थर, निकल, क्रोमाइट और कई अन्य खनिजों की संभावनाएं बताई जाती हैं. यदि राज्यों के बीच सहयोग बढ़ता है तो निवेशकों का भरोसा भी मजबूत होगा और नई परियोजनाओं को गति मिलेगी. इसका सीधा असर रोजगार, उद्योग और बुनियादी ढांचे के विकास पर पड़ेगा. लंबे समय से विकास की मुख्यधारा से दूर रहे कई इलाकों में आर्थिक गतिविधियां बढ़ सकती हैं.

अमित शाह ने क्या कहा?

समझौते के दौरान अमित शाह ने कहा कि यह किसी की हार या जीत का मामला नहीं है. इसमें भारत, असम और नागालैंड तीनों की जीत हुई है. उन्होंने कहा कि दोनों राज्यों ने तत्काल राजनीतिक लाभ से ऊपर उठकर राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता दी है. शाह ने असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा और नागालैंड के मुख्यमंत्री नेफियू रियो की भी तारीफ की. उनके मुताबिक दोनों नेताओं ने विवादों को पीछे छोड़कर विकास का रास्ता चुना. उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विकसित और समृद्ध पूर्वोत्तर का सपना तभी पूरा होगा जब क्षेत्र की प्राकृतिक संपदा का सही उपयोग किया जाए.

क्या भारत की ऊर्जा तस्वीर बदल सकती है?

विशेषज्ञों का मानना है कि केवल असम-नागालैंड का यह समझौता भारत को तेल आयात से पूरी तरह मुक्त नहीं कर सकता. लेकिन यह देश की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम जरूर है.आज दुनिया में ऊर्जा को लेकर भू-राजनीतिक संघर्ष बढ़ रहे हैं. रूस-यूक्रेन युद्ध हो या पश्चिम एशिया का तनाव, हर संकट का असर तेल बाजार पर पड़ता है. ऐसे में घरेलू उत्पादन बढ़ाना किसी भी देश के लिए रणनीतिक मजबूरी बन गया है. भारत भी अब इसी दिशा में आगे बढ़ रहा है. असम और नागालैंड की धरती के नीचे छिपे तेल और गैस के भंडार को निकालने की तैयारी सिर्फ एक आर्थिक फैसला नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और ऊर्जा आत्मनिर्भरता से जुड़ा बड़ा दांव है.



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