जामताड़ा. जरा सोचिए… 21वीं सदी के भारत में एक ऐसा गांव, जहां लोग नल या चापाकल नहीं, बल्कि खेतों के गंदे गड्ढों से रिस-रिसकर निकलने वाला पानी पीने को मजबूर हैं. जहां महिलाएं घंटों इंतजार कर एक लोटा पानी भरती हैं और बच्चे उसी मटमैले पानी से अपनी प्यास बुझाते हैं. सरकारी फाइलों में यहां “हर घर नल जल योजना” पहुंच चुकी है, लेकिन हकीकत में गांव के सूखे नल आज भी विकास के दावों का मजाक उड़ा रहे हैं. जामताड़ा के बड़कुड़ी चक गांव की यह तस्वीर सिर्फ पानी की कमी नहीं, बल्कि सिस्टम की बड़ी विफलता की कहानी बयां कर रही है.
दरअसल झारखंड के जामताड़ा जिले से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जिसने सरकारी योजनाओं और विकास के दावों की हकीकत उजागर कर दी है. जिला मुख्यालय से करीब 60 किलोमीटर दूर नाला प्रखंड अंतर्गत बड़ारामपुर पंचायत के बड़कुड़ी चक गांव में आज भी लोग स्वच्छ पेयजल के लिए तरस रहे हैं. हालात इतने बदतर हैं कि गांव के करीब 40 आदिवासी परिवारों की लगभग 200 की आबादी गंदे, बदबूदार और कीचड़युक्त पानी को पीने के लिए मजबूर है.
जानवर भी जिस पानी को न पिएं, वही पी रहे ग्रामीण!
भीषण गर्मी के बीच गांव की महिलाएं और बच्चे करीब दो किलोमीटर दूर खेतों में बने गड्ढों से पानी लाकर अपनी प्यास बुझा रहे हैं. खेत में खोदे गए छोटे गड्ढे, जिसे स्थानीय भाषा में “डांडी” कहा जाता है, वहीं से धीरे-धीरे रिसकर आने वाला मटमैला पानी घंटों इंतजार के बाद इकट्ठा किया जाता है. यही पानी पशु भी पीते हैं. ग्रामीणों का कहना है कि मजबूरी ऐसी है कि उसी गंदे पानी को छानकर पीना पड़ रहा है.
ग्रामीण नीलिमा सोरेन और कविता मरांडी ने बताया कि सुबह से शाम तक सिर्फ पानी लाने की जद्दोजहद चलती रहती है. कई बार ऊपर का गंदा पानी हटाकर घंटों इंतजार करना पड़ता है, तब जाकर एक बर्तन पानी मिल पाता है. सबसे ज्यादा परेशानी बच्चों, बुजुर्गों और गर्भवती महिलाओं को हो रही है.
हर घर नल जल योजना सिर्फ कागजों तक सीमित
ग्रामीणों के अनुसार करीब एक साल पहले गांव में “हर घर नल जल योजना” के तहत पाइपलाइन बिछाई गई थी. उस समय लोगों को उम्मीद जगी थी कि अब गांव में साफ पानी पहुंचेगा. लेकिन पाइप बिछाने के बाद भी आज तक घरों में नल कनेक्शन नहीं दिया गया. नल तो लगाए गए, लेकिन उनमें कभी पानी नहीं आया. ग्रामीण रविलाल मुर्मू और राजू मरांडी ने आरोप लगाया कि विभागीय अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों को कई बार इस समस्या से अवगत कराया गया, लेकिन हर बार सिर्फ आश्वासन मिला. गांव में मौजूद छह चापाकलों में से तीन पूरी तरह खराब हैं, जबकि बाकी से निकलने वाला पानी आयरनयुक्त और दूषित है, जिसे पीना स्वास्थ्य के लिए खतरनाक माना जाता है.
दूषित पानी से बीमारी का खतरा
गांव की जलसहिया पार्वती मुर्मू ने बताया कि दूषित पानी पीने के कारण गांव में लोग अक्सर बीमार पड़ते हैं. बच्चों में पेट संबंधी बीमारियां और बुजुर्गों में कमजोरी की शिकायत आम हो चुकी है. लेकिन विकल्प नहीं होने के कारण लोग वही पानी पीने को मजबूर हैं. ग्रामीणों का कहना है कि यह समस्या नई नहीं है, बल्कि वर्षों पुरानी है. स्थानीय मुखिया दिलीप टुडू ने भी माना कि गांव में पेयजल संकट गंभीर रूप ले चुका है. उन्होंने कहा कि विभाग और प्रशासन को कई बार जानकारी दी गई, लेकिन अब तक स्थायी समाधान नहीं निकाला गया.
स्पीकर तक पहुंचा मामला
मामला जब स्थानीय विधायक सह झारखंड विधानसभा अध्यक्ष रवींद्र नाथ महतो तक पहुंचा, तब जाकर प्रशासन हरकत में आया. ग्रामीणों ने उनसे मिलकर गांव की स्थिति बताई, जिसके बाद स्पीकर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट कर कहा कि उन्होंने जिला उपायुक्त को मामले में आवश्यक निर्देश दिए हैं. उन्होंने अधिकारियों से भीषण गर्मी को देखते हुए तुरंत कार्रवाई सुनिश्चित करने को कहा है. इसके बाद गांव के खराब चापाकलों की मरम्मत शुरू कर दी गई है. हालांकि ग्रामीण इसे अस्थायी कदम मान रहे हैं. उनका कहना है कि जब तक नल जल योजना के तहत नियमित और स्वच्छ जलापूर्ति शुरू नहीं होती, तब तक उनकी समस्या खत्म नहीं होगी.
सरकारी दावों पर उठे सवाल
एक तरफ सरकार हर घर तक स्वच्छ पेयजल पहुंचाने का दावा कर रही है, वहीं दूसरी तरफ जामताड़ा का यह आदिवासी गांव आज भी गंदे गड्ढे के पानी पर निर्भर है. यह तस्वीर सरकारी योजनाओं के जमीनी क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल खड़े करती है. अगर जल्द स्थायी समाधान नहीं निकाला गया तो दूषित पानी के कारण गांव में गंभीर बीमारियां फैलने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता. फिलहाल गांव के लोग प्रशासन की कार्रवाई का इंतजार कर रहे हैं, लेकिन उनकी सबसे बड़ी मांग यही है कि उन्हें भी साफ और सुरक्षित पानी मिले, जो आज के दौर में उनका बुनियादी अधिकार है.