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जनरल सैम मानेकशॉ अचूक और अभेद्य रणनीति की वजह से महज 13 दिनों के भीतर भारतीय सेना ने ढाका को चारों तरफ से घेरकर ऐतिहासिक जीत दर्ज की. पाकिस्तान के जनरल नियाजी को अपने 90,000 से अधिक सैनिकों के साथ बिना किसी शर्त के भारतीय सेना के सामने सरेंडर करना पड़ा, जिसके परिणामस्वरूप दुनिया के नक्शे पर एक नए राष्ट्र ‘बांग्लादेश’ का उदय हुआ.
सैम बहादुर के फैसले ने बदल दिया था दक्षिण एशिया का इतिहास. (फाइल फोटो)
नई दिल्ली. सैम होर्मूसजी फ्रैमजी जमशेदजी मानेकशॉ का जन्म 3 अप्रैल 1914 को अमृतसर के एक पारसी परिवार में हुआ था. उनके पिता पेशे से डॉक्टर थे और वे सैम को भी डॉक्टरी की पढ़ाई के लिए लंदन भेजना चाहते थे. हालांकि सैम ने पिता के इस निर्णय के खिलाफ विद्रोह कर दिया और जुलाई 1932 में नवगठित भारतीय सैन्य अकादमी (आईएमए) के पहले बैच ‘द पायनियर्स’ में प्रवेश ले लिया.
उनका विवाह 22 अप्रैल 1939 को सिलू बोडे से हुआ. गोरखा सैनिकों की निडरता के कायल सैम का एक प्रसिद्ध कथन आज भी सेना में गूंजता है कि यदि कोई व्यक्ति कहता है कि उसे मौत से डर नहीं लगता, तो वह या तो झूठ बोल रहा है या फिर वह गोरखा है. गोरखा रेजिमेंट के सैनिकों ने ही उन्हें आदर से ‘सैम बहादुर’ का नाम दिया था.
सैम मानेकशॉ के नेतृत्व की सबसे बड़ी परीक्षा 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान हुई. अप्रैल 1971 में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पूर्वी पाकिस्तान में बढ़ते मानवीय संकट के कारण तुरंत सैन्य कार्रवाई का दबाव बनाया, तो जनरल सैम ने बड़ी बेबाकी से मना कर दिया. उन्होंने स्पष्ट किया कि मानसून की भारी बारिश के कारण सेना की गति रुक जाएगी और हार का जोखिम बढ़ जाएगा. उन्होंने सरकार से तैयारी के लिए कुछ महीनों का समय मांगा और 100 प्रतिशत सफलता का भरोसा दिया.
पाकिस्तान ने जब 3 दिसंबर 1971 की शाम भारतीय हवाई अड्डों पर हमला किया, तो सैम ने अपनी बहुआयामी और तीव्र सैन्य योजना को धरातल पर उतारा. युद्ध शुरू होने से पहले उन्होंने अपने जवानों को सख्त निर्देश दिए थे कि वे स्थानीय महिलाओं की गरिमा का पूरा सम्मान करें. सिर्फ 13 दिनों में भारत ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की और 90,000 से अधिक पाकिस्तानी सैनिकों को बिना किसी शर्त के आत्मसमर्पण करना पड़ा, जिसके परिणामस्वरूप बांग्लादेश का गठन हुआ.
सैम मानेकशॉ 15 जनवरी 1973 को सेवानिवृत्त हुए. चूंकि फील्ड मार्शल का पद जीवनभर के लिए होता है और इस पद का अधिकारी कभी सेवानिवृत्त नहीं होता, इसलिए वे पूर्ण वेतन के हकदार थे. ऐसा कहा जाता है कि नौकरशाही की बाधाओं के कारण उन्हें लंबे समय तक केवल आधी पेंशन ही मिलती रही. राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के हस्तक्षेप के बाद अप्रैल 2007 में तत्कालीन रक्षा सचिव शेखर दत्त ने अस्पताल जाकर उन्हें 1.16 करोड़ रुपए के बकाये का चेक सौंपा. 27 जून 2008 को तमिलनाडु के वेलिंगटन में फेफड़ों के संक्रमण के कारण इस महान नायक ने 94 वर्ष की आयु में अंतिम सांस ली.
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राकेश रंजन कुमार को डिजिटल पत्रकारिता में 10 साल से अधिक का अनुभव है. न्यूज़18 के साथ जुड़ने से पहले उन्होंने लाइव हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण, ज़ी न्यूज़, जनसत्ता और दैनिक भास्कर में काम किया है. वर्तमान में वह h…और पढ़ें