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दीवाली के लिए कोडरमा के किसान पप्पू कुमार फूल उगा रहे हैं। उन्हें इस सीजन में फूलों की बिक्री से एक लाख रुपए से ज्यादा कमाई की उम्मीद है। दीवाली पर गेंदा, रजनीगंधा, चमेली और उड़हुल फूलों की मांग रहती है। कई स्थानीय व्यापारी फूलों के लिए पश्चिम बंगाल पर निर्भर हैं। कोडरमा में स्थानीय स्तर पर फूलों की खेती से यह निर्भरता कम हो रही है। पप्पू कुमार झारखंड-बिहार सीमा पर कोडरमा जिले के डोमचांच प्रखंड के फुलवरिया गांव में खेती करते हैं। उन्होंने परंपरागत और सब्जी की खेती छोड़कर फूलों की खेती शुरू की। लॉकडाउन के वक्त गांव लौट शुरू की खेती
पप्पू 2006 से एक नेटवर्किंग कंपनी में काम कर रहे थे। उन्होंने देशभर में करीब 5 लाख लोगों का नेटवर्क बनाया था और अच्छी कमाई कर रहे थे। 2020 में कोरोना के दौरान लॉकडाउन लगा तो कंपनी का काम ठप हो गया। पप्पू बेरोजगार हुए और आर्थिक संकट में घिर गए। इसके बाद वे गांव लौटे और खेती करने का फैसला किया। उन्होंने एक कट्ठा जमीन से फूलों की खेती शुरू की। अब वे अपनी और लीज पर ली गई जमीन मिलाकर 3 एकड़ की खेत में फूल उगा रहे हैं। 20 फूलों की एक लड़ी 35 रुपए में
आज पप्पू अपने खेतों में लाल व पीला गेंदा, चेरी और जाफरी की व्यापक खेती करते हैं। वे 20 फूलों की एक लड़ी को 35 रुपए में बेचते हैं। उनके फूलों की मांग सिर्फ कोडरमा तक सीमित नहीं है, बल्कि रांची, हजारीबाग, रामगढ़, गिरिडीह, चतरा और बिहार के कई प्रमुख शहरों में भी नियमित रूप से भेजी जाती है। आज वे फूलों की बदौलत सालाना 10-12 लाख रुपए की आमदनी कर रहे हैं। इस सफलता ने पप्पू के जीवन को पूरी तरह बदल दिया है। वे समाज में एक सम्मानित जीवन जी रहे हैं और अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा दिला रहे हैं। इसके साथ ही उन्होंने गांव के लगभग एक दर्जन महिला-पुरुषों को रोजगार भी दिया है। युवाओं के लिए बने प्रेरणा स्त्रोत
इस पूरी यात्रा में उनकी पत्नी का अतुलनीय योगदान रहा है। कोरोना के मुश्किल दौर में उनकी पत्नी ने खेती में हाथ बंटाकर उनका हौसला बढ़ाया। पप्पू के परिवार का मानना है कि यदि कृषि विभाग की ओर से सब्सिडी पर सोलर पैनल और सिंचाई उपकरण उपलब्ध करा दिए जाएं, तो पानी की समस्या दूर हो जाएगी। इससे खेती का दायरा और बढ़ेगा, उत्पादन में तेजी आएगी तथा गांव के और भी लोगों को रोजगार मिल सकेगा। पप्पू की यह पहल क्षेत्र के युवाओं के लिए एक प्रेरणादायक संदेश है।
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