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Rabri Devi 10 circular road bungalow controversy: सर्कुलर रोड आवास खाली करने के आदेश को लेकर शुरू हुआ विवाद अब बिहार की राजनीति का बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है. पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी द्वारा सरकारी आवास खाली करने से इनकार और मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को खुली चुनौती दिए जाने के बाद सवाल उठ रहा है कि यदि यह टकराव और बढ़ता है तो सरकार के पास कौन-कौन से कानूनी और राजनीतिक विकल्प मौजूद हैं.
10 सर्कुलर रोड पर सियासी संग्राम, राबड़ी के रुख के बाद सम्राट सरकार अगला कदम क्या उठाएगी?
पटना. मुख्यमंत्री राबड़ी देवी द्वारा पटना स्थित ’10 सर्कुलर रोड’ आवास को किसी भी कीमत पर खाली न करने और मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को ‘फोर्स बुलाने’ की खुली चुनौती देने के बाद बिहार का बंगला विवाद अब एक बेहद गंभीर मोड़ पर पहुंच गया है. यह मामला अब महज एक प्रशासनिक नोटिस तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसमें गहरे कानूनी पेंच और बड़े राजनीतिक नफा-नुकसान जुड़ गए हैं. यदि राबड़ी देवी अपने स्टैंड पर कायम रहती हैं और स्वेच्छा से बंगला खाली नहीं करती हैं, तो सम्राट चौधरी सरकार के पास कानून की किताब से लेकर राजनीतिक कूटनीति तक कई रास्ते मौजूद हैं. आइए समझते हैं कि इस हाई-प्रोफाइल विवाद में सरकार के पास क्या कानूनी और राजनीतिक विकल्प हो सकते हैं.
राज्य सरकार के नियमों के अनुसार, सत्ता परिवर्तन या नए आवंटन की स्थिति में सरकारी आवास खाली कराना एक नियमित प्रशासनिक प्रक्रिया मानी जाती है. यदि कोई आवंटी निर्धारित अवधि के बाद भी आवास नहीं छोड़ता है तो संबंधित विभाग उसे अनधिकृत कब्जाधारी मानते हुए कानूनी प्रक्रिया शुरू कर सकता है. आमतौर पर पहले कारण बताओ नोटिस जारी किया जाता है, फिर जवाब संतोषजनक नहीं होने पर बेदखली की कार्रवाई और जुर्माने जैसी प्रक्रिया अपनाई जा सकती है. हालांकि 10 सर्कुलर रोड का मामला सामान्य प्रशासनिक कार्रवाई से कहीं आगे बढ़ चुका है, क्योंकि इसमें बिहार की दो प्रमुख राजनीतिक धाराएं आमने-सामने दिखाई दे रही हैं.
कानूनी विकल्प: ‘बिहार सरकारी परिसर (बेदखली) अधिनियम’ का इस्तेमाल
प्रशासनिक नियमों के तहत सरकार के पास सबसे अचूक हथियार कानून का होता है. अगर कोई अलॉटी तय समय सीमा के बाद भी सरकारी बंगला खाली नहीं करता तो भवन निर्माण विभाग ‘बिहार पब्लिक प्रेमाइसेस (इविक्शन) एक्ट’ (Bihar Public Premises Eviction Act) के तहत कार्रवाई शुरू कर सकता है.
- कारण बताओ नोटिस (Show Cause): इसके तहत विभाग की ओर से अनधिकृत कब्जेधारी (Unauthorized Occupant) को एक अंतिम नोटिस जारी कर पूछा जाता है कि उन्हें बेदखल क्यों न किया जाए.
- बलपूर्वक बेदखली और जुर्माना: यदि संतोषजनक जवाब नहीं मिलता है, तो सक्षम प्राधिकारी (Competent Authority) जिला प्रशासन और मजिस्ट्रेट की मदद से परिसर को बलपूर्वक खाली कराने का आदेश जारी कर सकता है. साथ ही, अनधिकृत रूप से रहने की अवधि का भारी बाजार मूल्य के हिसाब से जुर्माना (Damage Rent) भी वसूला जा सकता है.
राजनीतिक विकल्प: ‘वेट एंड वॉच’ और सहानुभूति कार्ड को बेकार करना
जानकार कहते हैं कि कानूनी रास्ते के अलावा सम्राट चौधरी सरकार को इसके राजनीतिक नफा-नुकसान को भी तौलना होगा. राजनीति के चश्मे से सरकार के पास दो रणनीतिक विकल्प हैं.
- सहानुभूति कार्ड को रोकना (कूटनीतिक रास्ता): आरजेडी इस समय इस मुद्दे को ‘लालू परिवार के उत्पीड़न’ और ‘विपक्षी नेताओं का अपमान’ के तौर पर भुनाने का प्रयास करेगी. अगर सरकार तुरंत पुलिस फोर्स भेजती है, तो राबड़ी देवी को जनता के बीच ‘सहानुभूति’ मिल सकती है. इससे बचने के लिए सरकार बातचीत का रास्ता चुन सकती है या किसी अन्य विकल्प की पेशकश कर सकती है.
- कानून का इकबाल बुलंद करना (आक्रामक रास्ता): मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की छवि एक कड़े और बेबाक फैसले लेने वाले नेता की है. अगर सरकार इस मामले में ढील देती है तो विपक्ष इसे सरकार की कमजोरी के रूप में प्रचारित कर सकता है. ऐसे में सरकार कोर्ट की शरण लेकर या कानूनी प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी रखकर यह संदेश दे सकती है कि ‘कानून के सामने कोई भी रसूखदार परिवार विशेष नहीं है’.
आगे क्या हो सकता है?
राजनीति और कानूनी पहलू के जानकार बताते हैं आरजेडी इस मुद्दे पर कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकती है और इस बेदखली के आदेश पर ‘स्टे ऑर्डर’ लेने का प्रयास कर सकती है. यदि कोर्ट से स्टे मिल जाता है तो राबड़ी देवी को कुछ समय की मोहलत मिल जाएगी, अन्यथा सम्राट सरकार को देर-सबेर कानून के तहत कड़े प्रशासनिक कदम उठाने ही होंगे. बहरहाल, आने वाले दिनों में इस विवाद की दिशा काफी हद तक कानूनी प्रक्रिया और राजनीतिक रणनीति पर निर्भर करेगी.
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