कृषि प्रधान गुमला जिले में अगस्त महीने की वर्षा खेती-किसानी के लिए एक तरफ वरदान साबित हो रही है, तो दूसरी तरफ निचले इलाकों में जलभराव और फसलों में फंगल बीमारियों का खतरा भी गहराने लगा है। मौसम विज्ञान विभाग और कृषि वैज्ञानिकों के आंकड़ों के मुताबिक, गुमला में अगस्त माह में सामान्यतः 265.7 मिमी बारिश होती है, जिसके मुकाबले इस बार 18 अगस्त तक ही 193.4 मिमी वर्षा दर्ज की जा चुकी है। यह औसत का लगभग 73 प्रतिशत है, जो मॉनसून की भरपाई और इस सीजन की फसलों के विकास के लिए बेहद अहम माना जा रहा है। अगस्त का यह महीना खरीफ फसलों के लिए निर्णायक दौर होता है, जिसके अपने सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलू सामने आ रहे हैं। धान की फसल को संजीवनी: धान की फसलों में कल्ले निकलने के लिए अगस्त का महीना बेहद संवेदनशील होता है। इस समय पानी की पर्याप्त उपलब्धता मिलने से पौधों में पोषक तत्वों का अवशोषण तेजी से होता है, जिससे पैदावार बेहतर होने की उम्मीद बढ़ जाती है। लगातार हो रही बारिश से मिट्टी की नमी लंबे समय तक बरकरार रहेगी। इसका सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि किसानों को आगामी रबी फसलों (जैसे चना, सरसों और मटर) की अगेती बुआई के लिए जमीन तैयार करने में काफी सहूलियत मिलेगी। गुमला के ऊंचे भू-भागों यानी टांड़ जमीनों पर उगाई जाने वाली मकई, अरहर और उड़द जैसी फसलों को जल तनाव से बड़ी राहत मिली है। मौसम विभाग के पूर्वानुमान के अनुसार, आने वाले दिनों में गुमला और आसपास के क्षेत्रों में मध्यम से हल्की बारिश का दौर लगातार जारी रहने की संभावना है। आसमान में आंशिक रूप से बादल छाए रहने से तापमान में बहुत अधिक बढ़ोतरी नहीं होगी, जो सामान्यतः फसलों के अनुकूल है। कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को सतर्क रहने की सलाह दी है। किसानों से अपील की गई है कि वे अपने खेतों में जलजमाव की स्थिति से निपटने के लिए अतिरिक्त पानी की निकासी का उचित प्रबंध तुरंत करें। इसके अलावा, यूरिया खाद का छिड़काव या कीट-नियंत्रण दवाओं का प्रयोग केवल बारिश रुकने और मौसम साफ होने के बाद ही करें, ताकि दवाइयां पानी के साथ बहकर बेकार न हों और फसलों को सही सुरक्षा मिल सके। जलभराव और जड़ों का सड़ना: जिले के निचले इलाकों (दोन जमीन) में अत्यधिक पानी जमा होने से पौधों की जड़ों तक ऑक्सीजन की पहुंच रुक जाती है, जिसे एनोक्सिक स्थिति कहा जाता है। इसके चलते जड़ें सड़ने लगती हैं और पौधे पीले पड़ने लगते हैं। कीट और फंगल बीमारियों का प्रकोप: लगातार बादलों के छाए रहने और उच्च आर्द्रता ( 85-90% से अधिक) के कारण धान की फसल में झुलसा रोग और शीथ ब्लाइट जैसी फंगल बीमारियां फैलने का खतरा बढ़ गया है। इसके अलावा मक्के की फसल में तना छेदक कीटों का हमला भी देखा जा सकता है। अत्यधिक बारिश के कारण मिट्टी की ऊपरी परत में मौजूद नाइट्रोजन जैसे जरूरी घुलनशील पोषक तत्व पानी के साथ बहकर या रिसकर निचली सतह में चले जाते हैं, जिससे पौधों को पोषण की कमी का सामना करना पड़ सकता है।
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