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Farmer Earning Well With Gerbera: समय के साथ खेती-किसानी का स्वरूप भी तेजी से बदल रहा है. पहले जहां किसान केवल पारंपरिक फसलों जैसे धान, गेहूं और सरसों पर निर्भर रहते थे, वहीं अब आधुनिक तकनीक और प्रशिक्षण की मदद से वे नई-नई फसलों की खेती कर रहे हैं. इस बदलाव ने किसानों की आय बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है. आज के दौर में कृषि विज्ञान केंद्र जैसे संस्थानों से प्रशिक्षण लेकर किसान तकनीकी खेती अपना रहे हैं और कम जमीन में ज्यादा मुनाफा कमा रहे हैं. यह बदलाव न केवल उनकी आर्थिक स्थिति सुधार रहा है, बल्कि उनके जीवन स्तर को भी बेहतर बना रहा है.
झारखंड के देवघर जिले के देवीपुर प्रखंड के गमरडीहा गांव के रहने वाले किसान टुनटुन पंडित इसकी एक मिसाल हैं. टुनटुन पंडित ने बहुत कम पढ़ाई की है, वे केवल चौथी कक्षा तक ही पढ़े हैं. एक समय था जब वे भी पारंपरिक खेती करते थे, लेकिन उस समय उनकी आमदनी इतनी कम थी कि घर चलाना भी मुश्किल हो जाता था.
खेती में मेहनत बहुत लगती थी, लेकिन उसके मुकाबले आमदनी बहुत कम होती थी. ऐसे में परिवार की जिम्मेदारियों को निभाना उनके लिए काफी चुनौतीपूर्ण हो गया था. टुनटुन पंडित ने हार नहीं मानी और अपनी स्थिति को बदलने का फैसला किया. उन्होंने कृषि विज्ञान केंद्र से प्रशिक्षण लिया और नई तकनीकों के बारे में जानकारी हासिल की.
इसके बाद उन्होंने जरबेरा फूल की खेती शुरू की. यह एक ऐसी खेती है जिसमें मेहनत तो लगती है, लेकिन सही तरीके से करने पर अच्छी आमदनी भी होती है. आज टुनटुन पंडित करीब चार कट्ठा जमीन में 3500 से 4000 जरबेरा के पौधे लगाए हुए हैं. इन पौधों से उन्हें सालाना करीब 4 लाख रुपये तक की आमदनी हो जाती है, जो उनके लिए एक बड़ी सफलता है.
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देवघर को देवों की नगरी कहा जाता है, जहां हर दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं. पूजा-पाठ और धार्मिक कार्यों में फूलों की काफी मांग रहती है, जिसका फायदा टुनटुन पंडित को भी मिल रहा है. उनके उगाए हुए जरबेरा फूल आसानी से बाजार में बिक जाते हैं, जिससे उन्हें लगातार अच्छी आय प्राप्त हो रही है. यही कारण है कि उन्होंने पारंपरिक खेती छोड़कर फूलों की खेती को अपनाया और आज वे एक सफल किसान बन गए हैं.
हालांकि, टुनटुन पंडित का जीवन इतना आसान नहीं रहा है. कुछ साल पहले उनकी पत्नी का निधन हो गया था, जिसके बाद उन पर परिवार की पूरी जिम्मेदारी आ गई. उन्होंने न केवल खेती संभाली, बल्कि अपने बच्चों की देखभाल भी खुद ही की. वे खेत में काम करने के साथ-साथ घर पर खाना बनाकर बच्चों को खिलाते थे और उनकी पढ़ाई का भी ध्यान रखते थे. यह समय उनके लिए बहुत कठिन था, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और लगातार मेहनत करते रहे.
आज उनकी मेहनत रंग लाई है. फूलों की खेती से हुई कमाई के दम पर उन्होंने अपने बड़े बेटे को बाहर पढ़ने भेजा और उसे अच्छी शिक्षा दिलाई. यही नहीं, उनका बेटा आज रेलवे में नौकरी कर रहा है, जो टुनटुन पंडित के संघर्ष और मेहनत का सबसे बड़ा परिणाम है. उनकी कहानी यह बताती है कि अगर इंसान मेहनत और सही दिशा में प्रयास करे, तो वह किसी भी परिस्थिति को बदल सकता है.
टुनटुन पंडित जैसे किसान आज के समाज के लिए प्रेरणा हैं. उन्होंने यह साबित कर दिया है कि कम पढ़ाई और सीमित संसाधनों के बावजूद भी सफलता हासिल की जा सकती है.
जरूरत है तो सिर्फ सही जानकारी, प्रशिक्षण और मेहनत की. उनकी यह सफलता कहानी न केवल अन्य किसानों को प्रेरित करती है, बल्कि यह भी बताती है कि खेती में बदलाव अपनाकर बेहतर भविष्य बनाया जा सकता है.