साल 2017 में देश के उपराष्ट्रपति पद का दायित्व संभालने के बाद एम. वेंकैया नायडू ने भारतीय जनता पार्टी की सक्रिय राजनीति से संन्यास ले लिया था. इसके बाद वे हमेशा दलगत राजनीति और पार्टी के मंचों से दूरी बनाए रहे. लेकिन रविवार का दिन कुछ अलग था. 77 वर्षीय पूर्व उपराष्ट्रपति अपने दिल में आदर और संवेदनाओं का अगाध सागर लिए घर से बाहर निकले. अवसर था पूर्व प्रधानमंत्री और भारत रत्न श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयी जी की 8वीं पुण्यतिथि का, जहां वे अपने प्रिय नेता को श्रद्धांजलि अर्पित करने पहुंचे.
यूं शुरू हुआ अटल-वेंकैया का अटूट सफर
वेंकैया नायडू के जीवन और सार्वजनिक यात्रा पर अटल जी का प्रभाव किसी अमिट छाप की तरह है. 60 के दशक की वे शुरुआत यादें आज भी उनके दिल में जीवंत हैं, जब वे अपने गृहनगर नेल्लोर में तांगे पर सवार होकर पूरे शहर में घूम-घूमकर अटल जी के आगमन और सभाओं का प्रचार किया करते थे.
उस दौर के एक साधारण कार्यकर्ता पर अटल जी ने जो अगाध प्रेम, वात्सल्य और मार्गदर्शन बरसाया, उसने एक नौजवान के जीवन को नई दिशा दे दी. जिन्हें कभी युवा कार्यकर्ता ‘तरुण हृदय सम्राट’ कहकर पुकारते थे, उन अटल जी का मार्गदर्शन पाना नायडू जी अपने जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य मानते हैं.
वेंकैया पर जब अटल जी ने जताया अटूट विश्वास
वेंकैया नायडू के अनुसार, अटल जी से पहली मुलाकात उनके जीवन का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट थी. अटल जी केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि उनके मेंटर और जीवन के रोल मॉडल थे. अटल जी ने ही नायडू जी की इच्छा को सम्मान देते हुए उन्हें अपनी कैबिनेट में ग्रामीण विकास मंत्रालय जैसा जन-सरोकारों से जुड़ा अहम विभाग सौंपा. इतना ही नहीं, भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में वेंकैया नायडू के नाम का प्रस्ताव खुद अटल जी ने ही किया था. एक पिता समान मार्गदर्शक का यह अटूट भरोसा ही था जिसने नायडू को सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी, ओजस्वी राष्ट्रवाद और मानवीय संवेदनाओं के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा दी.
अटल जी से सीखे वेंकैया, अंतिम व्यक्ति तक विकास का संकल्प
अटल जी का मानना था कि सच्चा शासन वही है जो समाज की सबसे निचली सीढ़ी पर खड़े अंतिम व्यक्ति के चेहरे पर मुस्कान ला सके. वे ‘सुराज्य’ और पारदर्शी गुड गवर्नेंस के पक्षधर थे. वेंकैया स्वीकारते हैं कि उन्होंने ये सारे गुण वाजपेयी जी से ही सीखे.
स्वास्थ्य, शिक्षा, पेयजल, स्वच्छता और सुरक्षा जैसी मूलभूत सुविधाएं सीधे जनता तक पहुंचाना उनके शासन का मूल मंत्र था. महात्मा गांधी के रामराज्य के सपने की तरह अटल जी भी एक ऐसे समाज की कल्पना करते थे जहां कोई असमानता या अन्याय न हो. उन्होंने विकास को केवल आंकड़ों तक सीमित न रखकर उसे एक ‘मानवीय चेहरा’ दिया.
पूर्व उपराष्ट्रपति मानते हैं कि अटल जी का व्यक्तित्व एक ऐसा चुंबकीय प्रभाव रखता था जो विरोधियों को भी अपना मुरीद बना लेता था. छह दशकों से अधिक लंबे अपने राजनीतिक करियर में उन्होंने लगभग 56 वर्ष विपक्ष में बिताए, लेकिन अपनी गरिमा, शालीनता और रचनात्मक सोच से उन्होंने पंडित जवाहरलाल नेहरू से लेकर हर दौर के नेताओं का दिल जीता.
वे मानते थे कि ‘हम दोस्त बदल सकते हैं, लेकिन पड़ोसी नहीं.’ उनकी यही कूटनीतिक दूरदर्शिता और उदारता भारत की विदेश नीति का स्तंभ बनी. ‘मिशन कनेक्ट इंडिया’ के तहत स्वर्णिम चतुर्भुज और ग्रामीण सड़कों का जाल बिछाकर उन्होंने आधुनिक भारत की नीव रखी.
एक युगपुरुष की अमिट छाप
अटल जी एक कोमल हृदय कवि और संवेदनशील इंसान थे, लेकिन राष्ट्रहित की बात आने पर वे पोखरण-II और कारगिल संघर्ष के समय चट्टान की तरह अडिग भी रहे. उन्होंने ‘जय जवान, जय किसान’ के साथ ‘जय विज्ञान’ जोड़कर देश को ज्ञान और तकनीक की ताकत से परिचित कराया.
वेंकैया नायडू का दलगत राजनीति से दूर रहने के बावजूद ‘सदैव अटल’ पहुंचना कोई राजनीतिक घटनाक्रम नहीं था, बल्कि यह एक शिष्य का अपने महान गुरु, पथ-प्रदर्शक और ‘फिलॉसफर किंग’ के प्रति निश्छल, भावुक और अनंत श्रद्धा-सुमन था. अटल जी भले ही भौतिक रूप से हमारे बीच न हों, लेकिन उनका विज़न और उनका दुलार उन लाखों दिलों में हमेशा अमर रहेगा, जिन्हें उन्होंने छुआ था.