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झारखंड राज्य सभा चुनाव के नतीजे कई संकेत दे रहे हैं. वे बता रहे हैं कि राजद का या तो अपने विधायकों पर कंट्रोल नहीं है, या फिर कांग्रेस पर भरोसा नहीं. वे बता रहे हैं कि हेमंत सोरेन भी राहुल गांधी को भाव नहीं दे रहे हैं. लेकिन क्या झारखंड मुक्ति मोर्चा एनडीए को मैसेज दे रही है?
झारखंड राज्यसभा चुनाव का मैसेज बड़ा क्लियर है.
झारखंड राज्यसभा चुनाव के नतीजे आए और इंडिया अलायंस में एक और टूट की बातें होने लगीं, लेकिन क्यों? वहां तो कांग्रेस के सबसे मजबूत कंधे थे. वो हेमंत सोरेन थे, जिनके साथ कांग्रेस का बहुत खास कनेक्शन है. वो तेजस्वी यादव थे, जो राहुल गांधी को भाई की तरह मानते हैं. भाकपा माले वाले भी अक्सर साथ खड़े नजर आते हैं. तो ऐसा हुआ क्या? कहानी साफ है, कांग्रेस को लगा था कि इंडिया अलायंस के पास वोट पूरे हैं. उनके भाई हर समय साथ देंगे, लेकिन यहां तो खेल ही पलट गया. दूसरों का तो छोड़िए, अपने भी साथ छोड़ गए. इसकी झुंझलाहट झारखंड कांग्रेस प्रभारी के बयानों से साफ झलकती है.
कांग्रेस उम्मीदवार प्रणव झा की हार के बाद झारखंड कांग्रेस के प्रभारी के राजू ने कहा, आरजेडी और माले के विधायकों ने हमारे साथ धोखा कर दिया. उन्होंने हमारे कैंडिडेट को वोट नहीं दिया. कांग्रेस के सभी 16 वोट सुरक्षित रहे, JMM ने 4 वोट दिए और कांग्रेस को कुल 20 वोट मिले. यह स्थिति इसलिए बनी क्योंकि निर्दलीय उम्मीदवार ने पैसे का इस्तेमाल किया. हमारे गठबंधन के साथी ही साथ नहीं रहे. अगर इंडिया अलायंस के सभी सहयोगी पूरी मजबूती के साथ साथ खड़े रहते, तो परिणाम अलग हो सकता था. निश्चित तौर पर अलायंस पर भी इसका असर होगा. कांग्रेस विधायक दीपिका पांडेय सिंह ने भी प्रणव झा की हार के लिए आरजेडी और माले को जिम्मेदार ठहराया. उन्होंने कहा कि महागठबंधन की मजबूती का दावा करने वाले सहयोगी दलों को अपने रुख को स्पष्ट करना चाहिए. यह बयान इंडिया अलायंस में दरार की ओर इशारा है.
राजद-माले के पास तो सिर्फ 6 वोट तो 8 कम क्यों हुए?
झारखंड विधानसभा का गणित देखें तो 81 सीटों वाले सदन में राजद के पास 4 और भाकपा-माले के 2 पास विधायक हैं. कुल मिलाकर इन दोनों के 6 वोट ही बनते हैं, लेकिन कांग्रेस कैंडिडेट को 8 वोट कम मिले. यहीं पर झारखंड मुक्ति मोर्चा का नाम आता है. झामुमो ने अपने कैंडिडेट के लिए 28 नहीं, पूरे 30 वोट सिक्योर कर लिए. यानी दो वोट यहां से कम हो गए. नतीजा कांग्रेस का कैंडिडेट हार गया. अगर राजद के सभी विधायक वोट दिए भी होते तो भी प्रणव झा के लिए जीतना आसान नहीं था.
हेमंत सोरेन एनडीए को दे रहे सिग्नल?
सियासी गलियारों में कानाफूसी है कि झारखंड मुक्ति मोर्चा किसी भी वक्त एनडीए का दामन थाम सकती है. राज्यसभा चुनाव नतीजों से इसे और बल मिलता है. सवाल है कि जब इंडिया गठबंधन के पास 56 का आंकड़ा था, तो मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कांग्रेस उम्मीदवार प्रणव झा को क्यों डूबने दिया? फैक्ट यह है कि जीत के लिए 28 वोट चाहिए थे, लेकिन सोरेन ने अपने उम्मीदवार बैजनाथ राम के लिए 31 वोट सुरक्षित कर लिए. झामुमो ने जरूरत से तीन वोट ज्यादा लिए, जबकि कांग्रेस सिर्फ 19 वोटों पर सिमट गई. यह चाल कांग्रेस को सीधा मैसेज है कि झारखंड में बॉस सिर्फ झामुमो है और किसी की धौंस बर्दाश्त नहीं होगी. झारखंड की सियासत को समझने वाले कह रहे कि इसके पीछे सोरेन की गहरी रणनीति है. वो अपने विधायकों को एकजुट रखकर एनडीए को संदेश दे रहे हैं कि उनके किले में कोई सेंध नहीं लगा सकता. अपने प्रत्याशी को एक्स्ट्रा वोट दिलाकर और कांग्रेस की लुटिया डुबोकर, सोरेन ने बड़ी चालाकी से दोनों तरफ रास्ते खुले रखे हैं. राजनीति में कोई सगा नहीं होता. आगे कुछ भी संभव है…
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Mr. Gyanendra Kumar Mishra is associated with hindi.news18.com. working on home page. He has 20 yrs of rich experience in journalism. He Started his career with Amar Ujala then worked for ‘Hindustan Times Group…और पढ़ें