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इन दिनों धान की फसल में झंडा रोग किसानों की चिंता बढ़ा रहा है. फ्यूजेरियम फ्यूजीकुरोई फंगस से होने वाली इस बीमारी में पौधे असामान्य रूप से लंबे, पतले और पीले दिखाई देते हैं. समय पर नियंत्रण न होने पर पैदावार में भारी कमी हो सकती है. एक्सपर्ट ने संक्रमित पौधों को तुरंत उखाड़कर नष्ट करने, खेत से अतिरिक्त पानी निकालने और उचित फंगीसाइड का इस्तेमाल करने की सलाह दी है.
शाहजहांपुर: धान के खेतों में ‘झंडा रोग’ का प्रकोप किसानों के लिए चिंता का सबब बन रहा है. इस बीमारी में पौधे सामान्य से अत्यधिक लंबे, पतले और हल्के पीले पड़ जाते हैं, जो दूर से झंडे की तरह अलग दिखाई देते हैं. समय पर रोकथाम न होने पर यह फंगस जनित रोग पूरी फसल को सुखाकर नष्ट कर सकता है, जिससे पैदावार में 20 से 50 प्रतिशत तक की भारी गिरावट आती है. एक्सपर्ट ने किसानों को सलाह दी है कि खेत में बीमारी के लक्षण दिखते ही तुरंत संक्रमित पौधों को उखाड़कर नष्ट करें और सही फंगीसाइड का छिड़काव करें.
प्रगतिशील युवा किसान रनजोद सिंह ने बताया कि ‘झंडा रोग ‘फ्यूजेरियम फ्यूजीकुरोई’ नामक फंगस से फैलता है. यदि खेत में बीमारी आ गई है, तो सबसे पहले प्रभावित पौधों को जड़ से उखाड़कर खेत से दूर दबा दें या जला दें. इसके बाद खेत के पानी को बाहर निकाल दें और मिट्टी को थोड़ा सूखने दें. रोग के फैलाव को रोकने के लिए प्रति लीटर पानी में 2 ग्राम कार्बेंडाजिम + मैनकोजेब (SAAF) या ट्राइसाइक्लाजोल मिलाकर छिड़काव करें. याद रखें कि यूरिया का अत्यधिक प्रयोग इस बीमारी को और बढ़ा सकता है, इसलिए नाइट्रोजन की खुराक नियंत्रित रखें और केवल सही फंगीसाइड का ही उपयोग करें.
रोग की पहचान और लक्षण
झंडा रोग की सबसे बड़ी पहचान यह है कि प्रभावित पौधे बाकी पौधों की तुलना में तेजी से लंबे और पतले हो जाते हैं. इन पौधों की पत्तियां पीली पड़ने लगती हैं और तने के निचले हिस्से या जड़ों के पास सफेद-गुलाबी फंगस दिखाई देती है. धीरे-धीरे पौधा खोखला हो जाता है और सूखकर गिर पड़ता है. इस बीमारी के कारण पौधे में या तो बालियां बनती ही नहीं या बहुत हल्की और बांझ रह जाती हैं.
रोग आते ही तुरंत करें ये काम
यदि खेत में झंडा रोग के लक्षण दिखने लगें, तो तुरंत कदम उठाना जरूरी है. सबसे पहले संक्रमित पौधों को सावधानीपूर्वक जड़ सहित उखाड़ें और खेत से दूर गड्ढे में दबा दें. खेत में जमा अतिरिक्त पानी को तुरंत बाहर निकाल दें, क्योंकि रुका हुआ पानी इस फंगस को तेजी से फैलाता है. साथ ही, खेत में नाइट्रोजन यानी यूरिया का उपयोग बिल्कुल रोक दें, क्योंकि इससे पौधों की असामान्य लंबाई और तेजी से बढ़ती है.
रासायनिक और जैविक उपचार
बीमारी को आगे फैलने से रोकने के लिए 2 ग्राम कार्बेंडाजिम 12% + मैनकोजेब 63% WP (जैसे साफ) प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें. अगर प्रकोप अधिक हो तो टेबूकोनाज़ोल + ट्राइफ्लॉक्सीस्ट्रोबिन का उपयोग भी कारगर साबित होता है. जैविक उपचार के लिए खेत की सिंचाई के पानी के साथ ट्राइकोडर्मा 2-3 किलोग्राम प्रति एकड़ के हिसाब से गोबर की खाद में मिलाकर प्रयोग करें, जिससे मिट्टी में मौजूद हानिकारक फंगस नष्ट हो जाती है.
भविष्य के लिए बचाव के उपाय
झंडा रोग से स्थायी बचाव के लिए बीज शोधन (Seed Treatment) सबसे असरदार तरीका है. बुवाई से पहले प्रति किलो बीज को 2-3 ग्राम ट्राइकोडर्मा या कार्बेंडाजिम से उपचारित जरूर करें. नर्सरी तैयार करते समय और रोपाई के दौरान जड़ों को फंगीसाइड के घोल में 30 मिनट डुबोकर लगाएं. हमेशा रोग-प्रतिरोधी किस्मों का चयन करें और एक ही खेत में बार-बार एक ही फसल लेने की बजाय फसल चक्र अपनाएं ताकि मिट्टी में फंगस का असर खत्म हो सके.
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विवेक कुमार एक सीनियर जर्नलिस्ट हैं, जिन्हें मीडिया में 10 साल का अनुभव है. वर्तमान में न्यूज 18 हिंदी के साथ जुड़े हैं और हरियाणा, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की लोकल खबरों पर नजर रहती है. इसके अलावा इन्हें देश-…
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