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Palamu News: पलामू जिला हर साल बढ़ती गर्मी से जूझ रहा है. कभी जंगलों और पानी के लिए पहचाने जाने वाले इस इलाके में अब तापमान दिन पर दिन लगातार बढ़ रहा है. विशेषज्ञों का कहना है कि जंगलों की कटाई और घटते जल स्रोत इसके बड़े कारण हैं और आगे जाकर यह शहर रेगिस्तान जैसी हालत में पहुंच सकता है.
पलामू. झारखंड का पलामू जिला इन दिनों लगातार बढ़ती गर्मी, घटते जल स्रोत और बदलते मौसम के कारण चर्चा का विषय बना हुआ है. कभी घने जंगलों और प्राकृतिक संसाधनों के लिए पहचाना जाने वाला यह इलाका आज जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभावों का सामना कर रहा है. पिछले एक दशक में यहां गर्मी का प्रकोप तेजी से बढ़ा है. कई बार पलामू देश के सबसे गर्म जिलों में शामिल रहा है.
वर्ष 2024 में यहां 47.4 डिग्री सेल्सियस तापमान दर्ज किया गया, जो पूर्वी भारत में सबसे अधिक था. इससे पहले भी 2019 और 2022 में तापमान 46 से 47 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच चुका है. इस वर्ष भी तापमान लगातार 43 से 44 डिग्री सेल्सियस के बीच बना हुआ है.
प्रकृति का प्रकोप ही नहीं, मानवीय गतिविधियां भी जिम्मेदार
पर्यावरण विशेषज्ञ डॉ. डी.एस. श्रीवास्तव के अनुसार, पलामू की भौगोलिक स्थिति पहले से ही इसे गर्म क्षेत्र बनाती रही है. यह इलाका नेतरहाट, रांची और बिहार के रोहतास पठारी क्षेत्रों से घिरे रेन-शैडो जोन में स्थित है, जहां मानसूनी बादल अपेक्षाकृत कम पहुंचते हैं. इसके अलावा कर्क रेखा भी पलामू से होकर गुजरती है, जिससे यहां गर्मी स्वाभाविक रूप से अधिक रहती है. लेकिन वर्तमान संकट केवल प्राकृतिक कारणों से नहीं, बल्कि मानवीय गतिविधियों से भी जुड़ा है.
घट गया है वन क्षेत्र
डॉ. श्रीवास्तव बताते हैं कि वर्ष 1951 में पलामू क्षेत्र में लगभग 43 प्रतिशत वन क्षेत्र था, जो आज घटकर मात्र 10 से 11 प्रतिशत रह गया है. पर्यावरण संतुलन के लिए कम से कम 30 प्रतिशत वन क्षेत्र जरूरी माना जाता है. गांवों के आसपास की पहाड़ियां, जो कभी हरियाली से ढकी रहती थीं, अब लगभग नंगी हो चुकी हैं. पेड़-पौधों की कमी के कारण चट्टानें दिन में अत्यधिक गर्म हो जाती हैं और रात में तेजी से ठंडी होती हैं. यही कारण है कि दिन और रात के तापमान के बीच का अंतर पहले जहां लगभग 10 डिग्री होता था, वहीं अब यह 20 से 22 डिग्री तक पहुंच रहा है.
भविष्य में बड़ा खतरा
विशेषज्ञ इसे रेगिस्तानी जलवायु की शुरुआती चेतावनी मान रहे हैं. बढ़ती गर्मी, घटती वर्षा, जल संकट और वन क्षेत्र में लगातार कमी भविष्य के लिए गंभीर संकेत हैं. अगर जंगलों का संरक्षण, जल स्रोतों का पुनर्जीवन और पर्यावरण संतुलन की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में यह इलाका मरुस्थलीकरण की ओर बढ़ सकता है. यह केवल पर्यावरण का नहीं, बल्कि खेती, जल और मानव जीवन के भविष्य का भी बड़ा सवाल है.
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बुंदेलखंड यूनिवर्सिटी से मास कम्यूनिकेशन एंड जर्नलिज़्म में मास्टर्स, गोल्ड मेडलिस्ट. पत्रकारिता का सफर दैनिक जागरण से शुरू हुआ, फिर प्रभात खबर और ABP न्यूज़ से होते हुए News18 Hindi तक पहुंचा. करियर और देश की …और पढ़ें