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PM Modi Forgives Zen Z Abuse: जंतर-मंतर प्रदर्शन के दौरान कुछ Gen Z युवाओं की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए अभद्र भाषा के इस्तेमाल के बाद विवाद बढ़ा. ऐसे माहौल में पीएम मोदी ने सख्ती के बजाय अभिभावक वाला रास्ता चुना और वीडियो संदेश में इन युवाओं को माफ करने की बात कही. पीए मोदी ने कहा कि गुमराह बच्चों को सजा देने या अदालतों के चक्कर कटवाने से परिस्थितियां नहीं बदलेंगी. उन्होंने युवाओं को गले लगाकर राह दिखाने की जरूरत बताई. सवाल है कि क्या सजा के बजाय संवाद और भरोसे का यह तरीका नई शुरुआत बन सकता है? साथ ही पीएम मोदी ने अभिभावक वाला जो अंदाज अपनाया है वह अपने आप में अनोखा है.
पढ़ें PM मोदी के अभिभावक वाले संदेश का पूरा मतलब. (फाइल फोटो)
नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार फिर परिपक्वता का परिचय दिया है. इस बार उन्होंने युवा आक्रोश को प्रधानमंत्री बनकर नहीं, बल्कि अभिभावक बनकर संभालने की कोशिश की है. जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान कुछ Gen Z युवाओं की ओर से पीएम मोदी के लिए अभद्र भाषा का इस्तेमाल हुआ. मामला बढ़ा तो इसे सिर्फ गुस्से में निकले कुछ शब्द मानकर छोड़ देना आसान नहीं था. आखिर देश के प्रधानमंत्री के लिए सार्वजनिक मंच पर आपत्तिजनक भाषा कोई सामान्य बात नहीं है. लेकिन मोदी ने इस पूरे विवाद को अलग नजर से देखा. उन्होंने अपने वीडियो संदेश में उन युवाओं को माफ करने की बात कही. यहां मामला सिर्फ माफी का नहीं है. असली बात यह है कि प्रधानमंत्री ने खुद को सत्ता के सबसे ऊंचे पद पर बैठे व्यक्ति के बजाय एक अभिभावक की भूमिका में रखने की कोशिश की. जैसे घर का बड़ा बच्चा गलती करने पर उसे सिर्फ डांटता नहीं, बल्कि समझाता भी है. पीएम मोदी का संदेश भी कुछ ऐसा ही था… गलती हुई है, लेकिन बच्चे को गलती से बड़ा मत बना दीजिए.
यही वजह है कि इस पूरे घटनाक्रम को सिर्फ रुचिका या अन्य बच्चों के मामले तक सीमित करके देखना तस्वीर को छोटा कर देगा. जंतर-मंतर के प्रदर्शन में कुछ युवाओं की भाषा मर्यादा से बाहर गई. पुलिस और प्रशासन की कार्रवाई को लेकर पहले से ही आक्रोश था. उस माहौल में गुस्सा शब्दों में भी निकला. सवाल यह था कि सरकार इसका जवाब कैसे देती है? सख्ती से, मुकदमे से और गिरफ्तारी से? या बातचीत और समझाने के रास्ते से? प्रधानमंत्री ने फिलहाल दूसरा रास्ता चुना. उन्होंने कहा कि ये बच्चे गुमराह हो सकते हैं, लेकिन उन्हें सजा देने और अदालतों के चक्कर कटवाने से परिस्थितियां नहीं बदलेंगी. यह बात राजनीतिक रूप से भी दिलचस्प है. क्योंकि विरोध करने वाले युवा अगर कल की ताकत हैं तो उनसे संवाद तो करना ही होगा. हां इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं कि अभद्र भाषा सही है. बल्कि प्रधानमंत्री का संदेश शायद यही है कि गलत भाषा को गलत बताते हुए भी युवा को सुधारने का मौका दिया जा सकता है.
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