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भारत को प्रधानमंत्री चाहिए या अमेरिका जैसा राष्ट्रपति? इंदिरा से लेकर आडवाणी...


अगले महीने 3 नवंबर को अमेरिका में मध्यावधि चुनाव होने हैं. वहां प्रतिनिधि सभा की सभी 435 और सीनेट की 100 में से 35 सीटों के लिए मतदान होगा. हालांकि अमेरिका में राष्ट्रपति शासन प्रणाली लागू है, लेकिन प्रतिनिधि सभा व सीनेट के लिए होने वाले इन मध्यावधि चुनावों पर भी पूरी दुनिया की नजरें होती हैं. वजह? क्योंकि इन्हीं चुनावों से तय होता है कि अमेरिकी राष्ट्रपति प्रभावी बने रहेंगे या उनकी शक्तियों में कटौती हो जाएगी.

भारत के संविधान निर्माताओं ने भारतीय परिस्थितियों के मद्देनजर गहन विचार-विमर्श के बाद संसदीय व्यवस्था के वेस्टमिंस्टर मॉडल को अपनाया था. लेकिन यदा-कदा राजनीतिक सत्ता-प्रतिष्ठानों में अंदरखाने अमेरिका की राष्ट्रपति प्रणाली के प्रति एक अनकहा-सा आकर्षण बरकरार रहा है. कुछ मौकों पर इसके स्पष्ट साक्ष्य भी देखे जा सकते हैं.

संसदीय शासन प्रणाली की प्रभावशीलता पर संभवत: पहली बार सवाल 1980 के आखिरी महीनों में सत्तारूढ़ कांग्रेस (आई) की ओर से उठाए गए थे. अक्टूबर में ऑल इंडिया लॉयर्स कॉन्फ्रेंस में इस विषय पर कथित राष्ट्रीय बहस की शुरुआत सत्ता प्रतिष्ठान के करीबी वकीलों ने की थी. हालांकि प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने स्वयं इस मसले पर खुलकर कोई पक्ष नहीं लिया था. कानून मंत्री शिवशंकर ने संसद में कहा था कि मौजूदा संसदीय व्यवस्था की तुलना में राष्ट्रपति शासन प्रणाली भारत की परिस्थितियों के लिए अधिक उपयुक्त होगी या नहीं, इस पर किसी तरह का कोई विचार नहीं किया जा रहा है.

भले ही इंदिरा गांधी ने इस पूरे मसले पर चुप्पी बनाए रखी, लेकिन तत्कालीन राजनीतिक विश्लेषकों का साफतौर पर मानना था कि संसदीय व्यवस्था के वेस्टमिंस्टर मॉडल को कठघरे में खड़ा करने की रणनीति को प्रधानमंत्री का मौन समर्थन हासिल था. इसलिए पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने सुनिश्चित किया कि यह मुद्दा लगातार चर्चा में बना रहे. लिहाजा, दिसंबर में राजधानी में हुए अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के अधिवेशन में राष्ट्रपति शासन प्रणाली की खुलकर पैरवी की गई.

महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री ए.आर. अंतुले इसमें सबसे मुखर रहे. संविधान विशेषज्ञ नानी पालखीवाला ने भी राष्ट्रपति शासन प्रणाली के पक्ष में राय रखकर इस पूरे मसले को राजनीतिक परिचर्चा से आगे बढ़ाकर गंभीर संवैधानिक विमर्श की तरफ मोड़ दिया. उनका समर्थन इसलिए भी अहम था, क्योंकि उन्हें कांग्रेस (आई) का समर्थक नहीं माना जाता था.

आडवाणी ने भी कहा था – राष्ट्रपति शासन प्रणाली पर विचार हो…

ऐसा नहीं था कि राष्ट्रपति शासन प्रणाली की तरफदारी सिर्फ कांग्रेसी खेमों में ही देखने को मिली हो. वैचारिक रूप से कांग्रेस से सर्वथा अलग जमीन पर खड़ी भाजपा में भी इस प्रणाली के गुण-दोषों पर विचार-विमर्श करने की बात उठी थी. इसकी शुरुआत भी भाजपा के कद्दावर नेता लालकृष्ण आडवाणी ने उस वक्त की थी, जब उनकी राय को एक तरह से पूरी पार्टी की राय समझा जाता था.

अप्रैल 1998 में एक व्याख्यान में तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री आडवाणी ने संविधान की समीक्षा और राष्ट्रपति शासन प्रणाली के गुण-दोषों पर विचार करने की बात कही थी. यह वह दौर था, जब राजनीतिक अवसरवाद तथा गठबंधन सरकारों के बार-बार गिरने की वजह से कुछ हलकों में संसदीय व्यवस्था के वेस्टमिंस्टर मॉडल पर सवाल उठने शुरू हो गए थे. आडवाणी के बयान ने इस पर बहस को हवा दी थी कि क्या राष्ट्रपति शासन प्रणाली बेहतर राजनीतिक स्थिरता सुनिश्चित कर सकती है? हालांकि बाद में आडवाणी ने एक निजी चैनल को दिए इंटरव्यू में यह स्पष्ट कर दिया था कि वे राष्ट्रपति शासन प्रणाली की पैरवी नहीं करते हैं, बल्कि उनकी नजर में दोनों ही प्रणालियों में कुछ खासियतें व कुछ खामियां हैं.

जैसी की उम्मीद थी, आडवाणी की टिप्पणी पर राजनीतिक दलों की ओर से उनकी पार्टीगत सोच एवं विचारधारा के अनुरूप ही प्रतिक्रियाएं आईं. भाजपा को अपने नेता की बात में तर्क नजर आया तो कांग्रेस और संयुक्त मोर्चा के नेताओं ने इसे तानाशाही थोपने की ‘साजिश’ करार दिया.

आम लोगों की क्या राय थी?

मौजूदा शासन व्यवस्था में बदलाव के बारे में आम नागरिक क्या सोचते हैं, इसको लेकर उस समय एक विस्तृत सर्वे भी किया गया था. आईएमआरबी के सर्वेक्षण में लोगों से पूछा गया था कि क्या आपको लगता है कि भारत के लिए राष्ट्रपति शासन प्रणाली अधिक उपयुक्त होगी? केवल 27 फीसदी लोगों का मानना था कि यह व्यवस्था बेहतर होगी, जबकि 49 प्रतिशत लोगों ने स्पष्ट रूप से ‘नहीं’ कहा था. करीब 23 प्रतिशत लोग असमंजस में थे.



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