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रिम्स में बढ़ेगी न्यूरोसर्जरी की क्षमता, 70 नए बेड जुड़ेंगे; फर्श पर...




रिम्स के न्यूरोसर्जरी विभाग का जल्द ही बड़ा विस्तार होने जा रहा है। विभाग में लगातार बढ़ रहे मरीजों के दबाव को देखते हुए अस्पताल प्रबंधन ने महत्वपूर्ण निर्णय लिया है। इसके तहत नेत्र विभाग के दो वार्डों को स्थायी रूप से न्यूरोसर्जरी विभाग को सौंपा जा रहा है। इससे न्यूरोसर्जरी विभाग की क्षमता में उल्लेखनीय बढ़ोतरी होगी और मरीजों को बेहतर उपचार सुविधा मिल सकेगी। अस्पताल प्रबंधन के अनुसार, जिन वार्डों को न्यूरोसर्जरी विभाग के लिए आवंटित किया गया है, वहां मरम्मत और पुनर्निर्माण का कार्य शुरू हो चुका है। पुराने ढांचे को तोड़कर विभाग की आवश्यकताओं के अनुरूप नए सिरे से वार्ड तैयार किए जा रहे हैं। निर्माण कार्य के दौरान आधुनिक सुविधाओं और मरीजों की जरूरतों का विशेष ध्यान रखा जा रहा है। विभाग में बेड की कमी लंबे समय से एक बड़ी चुनौती बनी हुई थी। मरीजों की संख्या बढ़ने के कारण कई बार भर्ती और इलाज की प्रक्रिया भी प्रभावित होती थी। निर्माण कार्य पूरा होने के बाद न्यूरोसर्जरी विभाग में 60 से 70 अतिरिक्त बेड बढ़ जाएंगे। इससे गंभीर न्यूरोलॉजिकल बीमारियों से जूझ रहे अधिक मरीजों का इलाज करने में सुविधा होगी। अधिकारियों का कहना है कि अगले दो से तीन माह के भीतर निर्माण कार्य पूरा होने की उम्मीद है। इसके बाद विभाग की कुल क्षमता बढ़ जाएगी। साथ ही मरीजों को बेहतर सुविधा, अधिक बेड और उपचार के लिए कम इंतजार करना पड़ेगा। राज्यभर के मरीजों को मिलेगा लाभ विशेषज्ञों का मानना है कि विस्तार से गंभीर रोगियों को समय पर इलाज मिल सकेगा। अस्पताल प्रबंधन का कहना है कि विस्तार के बाद न्यूरोसर्जरी विभाग पहले की तुलना में अधिक व्यवस्थित, आधुनिक और मरीजों के अनुकूल बन सकेगा, जिससे राज्य के हजारों मरीजों को सीधे लाभ मिलेगा। उपकरण व वेंटिलेटर सुविधाएं भी बढ़ेंगी न्यूरोसर्जरी में केवल बेड क्षमता ही नहीं बढ़ाई जा रही, बल्कि वेंटिलेटर और अन्य महत्वपूर्ण चिकित्सा सुविधाओं का भी विस्तार किया जाएगा। हाल ही में विभाग में करीब डेढ़ से दो करोड़ रुपए की लागत से आधुनिक उपकरण स्थापित किए गए हैं। कई नए उपकरणों की खरीद भी प्रस्तावित है। नए वार्ड बनने से क्या होगा फायदा दो नए वार्ड तैयार होने के बाद न्यूरोसर्जरी विभाग में स्थायी रूप से 70 बेड तक की बढ़ोतरी होगी। इससे वेटिंग मरीजों को जल्द भर्ती किया जा सकेगा। फर्श पर इलाज कराने की स्थिति लगभग समाप्त हो जाएगी। ऑपरेशन के बाद मरीजों की निगरानी व नर्सिंग सेवाओं में सुधार आएगा। फर्श पर इलाज से मरीज और डॉक्टर दोनों परेशान बेड की कमी का असर केवल मरीजों पर ही नहीं पड़ता, बल्कि चिकित्सकों और नर्सिंग स्टाफ के कामकाज पर भी पड़ता है। फर्श पर भर्ती मरीजों की नियमित मॉनिटरिंग, दवा वितरण और जांच प्रक्रिया प्रभावित होती है। कई बार आपात स्थिति में मरीज तक समय पर पहुंचना मुश्किल हो जाता है। संक्रमण नियंत्रण और साफ-सफाई बनाए रखना भी चुनौती बन जाती है। अभी करीब 150 बेड, पर ये भी पड़ते हैं कम रिम्स में न्यूरोसर्जरी विभाग राज्य का सबसे बड़ा न्यूरो सेंटर माना जाता है। यहां झारखंड के अलावा बिहार, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और छत्तीसगढ़ से भी मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं। वर्तमान में विभाग में करीब 100 बेड के वार्ड और 40 से 50 बेड का आईसीयू संचालित है। इसके बावजूद मरीजों की संख्या इतनी अधिक रहती है कि कई बार बेड उपलब्ध नहीं हो पाते। स्थिति यह है कि गंभीर मरीजों को फर्श पर रहकर इलाज कराना पड़ता है। वार्डों में अतिरिक्त गद्दे लगाकर मरीजों को रखा जाता है, जिससे इलाज में भारी परेशानी होती है।



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