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महिलाओं के लिए बाहर दूसरे राज्यों शहरों में जाकर रोजगार कर पाना बहुत आसान नहीं है. ऐसे में उन्हें अपने गांव-घर और शहर में ही काम का मौका मिल जाए तो यह उनके लिए बेहतरीन मौका है. ऐसे में महिलाएं अपने गांव-घर में ही रोजगार कर सकें इसके लिए सरकारें उन्हें ट्रेनिंग देती हैं और कई योजनाओं से जोड़ती हैं. ये महिलाएं तरह-तरह के प्रोडक्ट तैयार करती हैं. रक्षाबंधन नजदीक है…
पलामू: रक्षाबंधन भाई-बहन के अटूट प्रेम और विश्वास का त्योहार है. जहां रेशम के धागे से बंधा यह रिश्ता हर साल इस पर्व को खास बना देता है. त्योहार नजदीक आते ही बाजारों में राखियों की रौनक बढ़ गई है. पलामू में इस बार भाई की कलाई सजाने के साथ-साथ महिलाएं अपने लिए रोजगार का अवसर भी तैयार कर रही हैं. जिले में सखी मंडल से जुड़ी महिलाएं अपने हाथों से आकर्षक राखियां तैयार कर रही हैं, जिनकी मांग स्थानीय बाजार के साथ जिले से बाहर भी पहुंच रही है.
दरअसल, पलामू जिले के तीन प्रखंडों में सखी मंडल की दीदियां राखी तैयार करने के काम में जुटी हैं. इस वर्ष करीब 40 हजार राखियां बनाने का लक्ष्य रखा गया है. पांडव प्रखंड में दस महिलाएं मिलकर करीब 10 हजार राखियां तैयार कर रही हैं. महिलाएं पिछले करीब एक महीने से राखी बनाने में जुटी हुई हैं. रेशम के धागे, मोती और स्वस्तिक समेत कई तरह की सजावटी सामग्री का इस्तेमाल कर अलग-अलग डिजाइन की राखियां तैयार की जा रही हैं.
सखी मंडल से जुड़ी सुनीता देवी ने बताया कि राखी बनाने का काम महिलाओं के लिए रोजगार का बेहतर माध्यम बन रहा है. एक राखी तैयार करने में करीब दो से तीन मिनट का समय लगता है. इसकी लागत लगभग चार से पांच रुपये आती है. तैयार राखियों को थोक में करीब 10 रुपये तथा खुदरा बाजार में 15 से 20 रुपये तक की कीमत पर बेचा जा रहा है. महिलाओं ने करीब 10 से 15 हजार राखियां तैयार की हैं, जिनकी बिक्री के लिए जिले के अलग-अलग हिस्सों में स्टॉल भी लगाए जा रहे हैं.
उन्होंने कहा कि त्योहार के मौसम में राखियों की मांग बढ़ने से उन्हें अच्छी आमदनी की उम्मीद है. खास बात यह है कि राखी तैयार करने के लिए बड़े निवेश की जरूरत नहीं है. घर और समूह स्तर पर महिलाएं इसे आसानी से तैयार कर रही हैं. इससे त्योहार के मौके पर भाई-बहन के रिश्ते को मजबूत करने वाली राखी के साथ महिलाओं के लिए आत्मनिर्भरता और रोजगार का नया रास्ता भी तैयार हो रहा है.
पलामू में सखी मंडल की महिलाओं की यह पहल बताती है कि स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों और हुनर को रोजगार से जोड़कर ग्रामीण महिलाएं अपनी आमदनी बढ़ा सकती हैं. रक्षाबंधन के इस पर्व पर इन महिलाओं द्वारा तैयार राखियां न सिर्फ भाई की कलाई की शोभा बढ़ाएंगी, बल्कि उनके परिवार की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने में भी योगदान देंगी.
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