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भास्कर न्यूज | गढ़वा प्रतापपुर गांव में 15 करोड़ रुपए से निर्मित अल्पसंख्यक आवासीय उच्च विद्यालय का भवन वर्ष 2025 में बनकर पूरी तरह तैयार हो चुका है, लेकिन शिक्षकों का पद सृजित नहीं होने से आज तक इसमें न तो कक्षाएं शुरू हो सकी हैं और न ही छात्रावास में विद्यार्थियों की चहल-पहल दिखाई दे रही है। भवन विभाग द्वारा निर्माण पूरा कर कल्याण विभाग को हैंडओवर भी कर दिया गया है, फिर भी विद्यालय संचालन की प्रक्रिया फाइलों में ही अटकी हुई है। करीब तीन एकड़ भूमि में आधुनिक सुविधाओं से लैस इस आवासीय विद्यालय का निर्माण कराया गया है। परिसर में शैक्षणिक भवन, 200 विद्यार्थियों की क्षमता वाला छात्रावास, कैंटीन सहित अन्य आवश्यक आधारभूत सुविधाएं विकसित की गई हैं। योजना के अनुसार यहां सीबीएसई एवं एनसीईआरटी पाठ्यक्रम के अनुरूप कक्षा छह से दसवीं तक की पढ़ाई होनी है। लेकिन भवन तैयार होने के एक वर्ष बाद भी स्कूल वीरान पड़ा है और करोड़ों की परिसंपत्ति उपयोग के इंतजार में धूल फांक रही है। यह विद्यालय करोड़ों रुपये खर्च कर शिक्षा के बेहतर इंतजाम का दावा करने वाली सरकारी व्यवस्था की सुस्ती का एक और उदाहरण बन गया है। शिक्षक व कर्मियों के पदों पर नहीं हो सका सृजन जानकारी के अनुसार, विद्यालय संचालन के लिए अब तक शिक्षकों और कर्मियों के पदों का सृजन नहीं किया गया है। इतना ही नहीं, विद्यालय के नियमित संचालन, छात्रावास की व्यवस्था और आवश्यक संसाधनों के लिए बजट का भी प्रावधान नहीं हो सका है। परिणामस्वरूप करोड़ों रुपये से बनी यह महत्वाकांक्षी परियोजना फिलहाल केवल एक खूबसूरत इमारत बनकर रह गई है। इस विद्यालय का शिलान्यास तत्कालीन मंत्री मिथिलेश कुमार ठाकुर ने किया था। सरकार की मंशा थी कि जिले के अल्पसंख्यक समुदाय के विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण आवासीय शिक्षा उपलब्ध कराई जाए, ताकि आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चे भी बेहतर शैक्षणिक वातावरण में पढ़ाई कर सकें। विद्यालय शुरू होने से गरीब परिवार के बच्चों को सहूलियत होगी।
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