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भास्कर न्यूज | सरायकेला लगभग तीन सौ वर्षों से अधिक पुरानी सरायकेला की पारंपरिक रथयात्रा शुक्रवार को श्रद्धा, भक्ति और जनआस्था के अद्भुत संगम के साथ संपन्न हो गई। दो दिवसीय रथयात्रा के दूसरे दिन अपराह्न तीन बजे महाप्रभु श्री जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा को मौसीबाड़ी स्थित गुंडिचा मंदिर तक पहुंचाने के लिए हजारों श्रद्धालु रथ खींचने में जुटे। दोपहर बाद शुरू हुई रथयात्रा के दौरान मौसम ने कई बार करवट बदली। झमाझम बारिश के बावजूद श्रद्धालुओं के उत्साह में कोई कमी नहीं दिखी। भक्त भीगते रहे, लेकिन उनके हाथों से रथ की रस्सी नहीं छूटी। “जय जगन्नाथ” के गगनभेदी उद्घोष के बीच श्रद्धालु महाप्रभु के रथ को खींचते हुए आगे बढ़ते रहे। इस दौरान महिलाओं ने भी बढ़-चढ़कर भागीदारी निभाई और रथ की रस्सी खींचकर स्वयं को इस पवित्र परंपरा का हिस्सा बनाया। रथयात्रा मार्ग पर जगह-जगह श्रद्धालुओं ने महाप्रभु का स्वागत किया। जैसे ही नंदीघोष रथ मौसीबाड़ी पहुंचा, भक्तों के बीच उल्लास का वातावरण छा गया। परंपरा के अनुसार अब महाप्रभु कुछ दिनों तक गुंडिचा मंदिर में विराजमान रहेंगे। रथयात्रा के सफल आयोजन में श्री जगन्नाथ सेवा समिति की महत्वपूर्ण भूमिका रही। समिति के अध्यक्ष लिपू महंती, राजा सिंहदेव, पार्थसारथी दास, राजेश मिश्रा, सुदीप पटनायक, राजीव महापात्र, रूपेश, दीपेश, सुमित महापात्र ,आकाश, कान्हू, गणेश सतपति, बादल दुबे, चिरंजीव महापात्र, परसु कबि एवं अन्य सदस्यों ने आयोजन को सफल बनाने में सक्रिय योगदान दिया। सरायकेला की रथयात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही सामाजिक और सांस्कृतिक एकता की जीवंत परंपरा है। यहां महाप्रभु के रथ की रस्सी खींचने के लिए किसी जाति, वर्ग, भाषा या समुदाय की सीमा नहीं होती। इस वर्ष भी इसका नजारा देखने को मिला, जब तेज बारिश के बीच बच्चे, युवा, महिलाएं और बुजुर्ग एक साथ रथ के पीछे चल पड़े। विशेष बात यह रही कि बारिश से बचने के बजाय श्रद्धालु उसे महाप्रभु का आशीर्वाद मानकर भीगते हुए रथ खींचते रहे। महिलाओं की बड़ी भागीदारी ने भी आयोजन को विशेष बना दिया। सरायकेला की यही परंपरा इसे अन्य रथयात्राओं से अलग पहचान देती है, जहां आस्था केवल मंदिरों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि पूरे नगर को एक सूत्र में बांध देती है। महाप्रभु की यह यात्रा हर वर्ष लोगों को प्रेम, समरसता और सामूहिक सहभागिता का संदेश देती है।
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