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सिलेंडर के दाम ने बिगाड़ा कैफे का स्वाद! रांची में अब कोयले...


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Cylinder price hike : रांची के पुरुलिया रोड स्थित अभिलाषा कैफे के संचालक कपिल बताते हैं, पहले के मुकाबले कठिनाई बहुत बढ़ गई है. अब हमें एक आदमी रखना पड़ रहा है जो कोयल जलाते हैं कोयला का आंच भी कभी तेज होता है, कभी कम होता है. मतलब एक समान नहीं होता. इस वजह से खाना पकाने में भी समस्या होती है.

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रांची. झारखंड की राजधानी रांची में भी गैस सिलेंडर के बढ़ते दामों का असर खासतौर पर छोटे कैफे और रेस्टोरेंट में अधिक देखने को मिल रहा है. आज से यानी 1 मई से फिर से गैस सिलेंडर के दामों में 995 रुपए की बढ़ोतरी देखने को मिली है. जिस वजह से अब रेस्टोरेंट और कैफे संचालक और भी नाराज नजर आ रहे हैं. यहां पर पहले बस एक बटन दबाते ही गैस स्टार्ट हो जाता था. लेकिन अब तो कोयला जलाने में ही 20-25 मिनट लग रहे हैं.

रांची के पुरुलिया रोड स्थित अभिलाषा कैफे के संचालक कपिल बताते हैं, पहले के मुकाबले कठिनाई बहुत बढ़ गई है अब हमें एक आदमी रखना पड़ रहा है जो कोयल जलाते हैं कोयला का आंच भी कभी तेज होता है, कभी कम होता है. मतलब एक समान नहीं होता. इस वजह से खाना पकाने में भी समस्या होती है. पहले जहां 10 मिनट में खाना परोसते थे, अब यही 20 से 25 मिनट लगता है.

ग्राहक हो जाते हैं नाराज
कपिल बताते हैं कि अब ग्राहक को 25 मिनट तक इंतजार करना पड़ता है.ऐसे में ग्राहक भी कई बार इरिटेट हो जाते हैं वह बार-बार पूछते हैं कि खाना कब आएगा. ऐसे में उन्हें भी समझाना पड़ता है कि भाई कमर्शियल सिलेंडर का दाम बढ़ चुका है और ब्लैक में करीबन 4 से ₹6000 तक डिमांड की जाती है, जो किसी के लिए भी स्वाभाविक नहीं है.

ऐसे में अब हम कोयला पर काम कर रहे हैं कोयला का आंच कभी कम होता है कभी अधिक होता है. ऐसे में खाना पकाने में भी दिक्कत होती है और एक आइटम पकाने में काफी समय लगता है, तो समस्या तो बहुत हो रही है. लेकिन क्या किया जा सकता है. अब कल से हम लोग भी अपने कैफे की कई सारे आइटम के दाम 20 से 30 रुपए तक बढ़ाने वाले हैं. क्योंकि, कोयला भी सस्ता कहां आता है.

सुबह में एक घंटा सिर्फ कोयला में
उन्होंने बताया रांची में फिलहाल जितने भी छोटे कैफे और रेस्टोरेंट है सबका यही हाल है. सुबह में एक घंटा कोयला का जो रख होता है उसे उठाकर फेंकने में लगता है, एक घंटा समय सिर्फ और सिर्फ इसी में जाता है और किचन भी थोड़ा गंदा हो जाती है, धुआं अधिक होती है. जिसे कई बार सांस लेने में भी तकलीफ होती है, तो समस्या तो बहुत बड़ी है. लेकिन बात है कि क्या किया जा सकता है.

About the Author

Amit Singh

7 वर्षों से पत्रकारिता में अग्रसर. इलाहबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स इन जर्नालिस्म की पढ़ाई. अमर उजाला, दैनिक जागरण और सहारा समय संस्थान में बतौर रिपोर्टर, उपसंपादक औऱ ब्यूरो चीफ दायित्व का अनुभव. खेल, कला-साह…और पढ़ें



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