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सुल्तानपुर का दारू से पुराना संबंध है. आज जब आबकारी विभाग के आंकड़े आते हैं तो दारु पीने के मामले में सुल्तानपुर जिला भी अव्वल रहता है लेकिन शायद कम ही लोगों को यह मालूम होगा कि सुल्तानपुर जिले का संबंध आज के 100 साल पहले भी दारू से रहा है. सुल्तानपुर की बनाई गई शराब सिर्फ सुल्तानपुर के ही लोग नहीं पीते थे बल्कि इसे प्रतापगढ़ और अन्य जनपदों में भी सप्लाई किया जाता था.
सुल्तानपुरः उत्तर प्रदेश का सुल्तानपुर जिला एक ऐतिहासिक जिला माना जाता है. यहां पर कई ऐसी कहानी घटित हुई जो इतिहास के पन्नों में हमेशा-हमेशा के लिए दर्ज हो गई. कुछ ऐसा ही संबंध सुल्तानपुर का दारू यानी कि शराब से भी रहा है. आज जब आबकारी विभाग के आंकड़े आते हैं तो दारु पीने के मामले में सुल्तानपुर जिला भी अव्वल रहता है लेकिन शायद कम ही लोगों को यह मालूम होगा कि सुल्तानपुर जिले का संबंध आज के 100 साल पहले भी दारू से रहा है. सुल्तानपुर की बनाई गई शराब सिर्फ सुल्तानपुर के ही लोग नहीं पीते थे बल्कि इसे प्रतापगढ़ और अन्य जनपदों में भी सप्लाई किया जाता था.
यहां थी डिस्टलरी
सुल्तानपुर के वरिष्ठ पत्रकार विक्रम बृजेंद्र सिंह लोकल 18 से बताते हैं कि 1903 ई तक ‘अंग्रेजी’ शराब सुल्तानपुर के आम लोगों की पहुंच से दूर थी.
सुल्तानपुर शहर के नजदीक रायबरेली रोग पर देसी डिस्टलरी थी जिसमें महुआ और शीरे की दारू का उत्पादन होता था. यहां ऐसी 30 भट्ठियां थी जिसे स्थानीय लोग संचालित करते थे. एच आर नेविल्स ने सुल्तानपुर गजेटियर में लिखा है कि सुल्तानपुर में जितनी दारू का उत्पादन होता था उतनी दारू सुल्तानपुर के लिए नाकाफी है. साल 1900 में जब प्रतापगढ़ जिले की डिस्टलरी बंद हो गई तो वहां भी यहीं से सप्लाई होती थी.
धांधली से हुई सीलबंदी
उस समय दारू की जितनी मांग थी उतनी आपूर्ति नहीं हो पाती थी. यही वजह थी कि अवैध तरीके से धांधली होने लगी. जब इसकी शिकायतें की गई तो पहले चरण में निकासी के मौके पर स्टॉक के छठवें हिस्से की बोतलों की सीलबंदी अनिवार्य की गई. सुल्तानपुर और दारू का संबंध काफी गहरा रहा है. यही वजह है कि देसी के ठेकों की नीलामी उन्नीसवीं सदी के आखिरी दशक में शुरू हो चुकी थी. इसे सरकारी राजस्व में वृद्धि की बड़ी संभावना के तौर पर देखा जाने लगा था. सुल्तानपुर में 1901 में डिस्टिलरी हेड ड्यूटी में 63 हजार रुपए मिला था. पूरे जिले भर में 179 ठेकों की नीलामी से कुल 26 हजार रुपए मिला था. पीने की आदत जिले के अलग-अलग इलाकों से ठेकों की कीमत से आंकी जाए तो शहर की सबसे महंगी दुकान एक हजार 900 रुपए सालाना पर थी.
760 रुपये में नीलाम हुई थी दुकान
रायपुर की एक हजार में और गौरीगंज की दुकान 760 रुपए में नीलाम हुई थी. इस तहसील की अन्य दुकानें भी राजस्व नजरिये से अच्छी मानी जाती थीं। मुसाफिरखाना और शुकुल बाजार इलाके की दुकानें भी बेहतर कमाई की कर रही थी. अंग्रेज हाकिम सबसे ज्यादा निराश कादीपुर तहसील से थे, जहां की कुल दुकानों से साल भर में बमुश्किल एक हजार की रकम जुटती थी. उस दौर में कादीपुर मुख्यालय की दुकान बारह रुपए से ज्यादा में कभी भी नहीं उठा.
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मैं रजनीश कुमार यादव, 2019 से पत्रकारिता से जुड़ा हूं. तीन वर्ष अमर उजाला में बतौर सिटी रिपोर्टर काम किया. तीन वर्षों से न्यूज18 डिजिटल (लोकल18) से जुड़ा हूं. ढाई वर्षों तक लोकल18 का रिपोर्टर रहा. महाकुंभ 2025 …और पढ़ें